ASI आदेश: भोजशाला बनी राजा भोज संस्कृत पाठशाला, 365 दिन पूजा
धार भोजशाला पर ASI का अब तक का सबसे बड़ा आदेश: हटाया गया ‘मस्जिद’ का नाम, अब आधिकारिक तौर पर कहलाएगा ‘राजा भोज संस्कृत पाठशाला’; हिंदुओं को 365 दिन पूजा का अधिकार
धार/इंदौर: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक ‘भोजशाला’ (Bhojshala) को मंदिर माने जाने के फैसले के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक प्रशासनिक आदेश जारी किया है।
इस नए आदेश के तहत एएसआई ने परिसर के नाम से ‘कमाल मौला मस्जिद’ के उल्लेख को पूरी तरह हटा दिया है।
अब प्रशासनिक और सरकारी तौर पर इस पूरे ऐतिहासिक स्थल को “राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के रूप में संबोधित किया गया है।
हिंदू संगठनों, सांस्कृतिक विशेषज्ञों और इतिहासकारों ने इसे ऐतिहासिक सत्य की पुनर्स्थापना और एक बहुत बड़ी जीत बताया है।
अब साल के 365 दिन बिना रोक-टोक होगी पूजा
मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल के अनुसार, हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में भोजशाला के मूल स्वरूप और वहां सदियों से चली आ रही हिंदू पूजा की निरंतरता को सर्वोपरि माना था।
इसी क्रम में कदम बढ़ाते हुए एएसआई द्वारा जारी नए आदेश में हिंदू समाज को वर्ष के सभी 365 दिनों तक बिना किसी रोक-टोक के नियमित पूजा-अर्चना करने का पूर्ण कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया गया है।
इसके साथ ही, पूर्व में लागू शुक्रवार की नमाज संबंधी व्यवस्था को पूरी तरह से निरस्त (Repeal) कर दिया गया है।
पूरी तरह खत्म हुई साल 2003 की पुरानी व्यवस्था
इस नए आदेश के बाद पिछले 23 सालों से चली आ रही पुरानी व्यवस्था का हमेशा के लिए अंत हो गया है:
क्या थी पुरानी व्यवस्था: वर्ष 2003 में लागू एएसआई की व्यवस्था के अनुसार, यहाँ सह-अस्तित्व का नियम था।
इसके तहत केवल मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की अनुमति थी। शेष दिनों में यह परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता था।
तनाव से मुक्ति: इस पुरानी व्यवस्था के कारण विशेषकर वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ने पर पूरे धार जिले में भारी सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन जाती थी। अब नई व्यवस्था से इस विवाद की जड़ ही समाप्त हो गई है।
धार सहित पूरे मध्य प्रदेश में जश्न का माहौल
एएसआई की इस नई और अंतिम प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलते ही धार, इंदौर सहित पूरे मध्य प्रदेश में श्रद्धालुओं और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के बीच भारी उत्साह देखा जा रहा है। लोगों ने इसे ‘वाग्देवी की घर वापसी’ के रूप में मनाया है।
कानूनी और पुरातात्विक विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और वैज्ञानिक साक्ष्यों के महत्व को पूरी दुनिया के सामने रेखांकित करता है।
यह स्थल लंबे समय से परमार वंश के महान राजा भोज की ज्ञान परंपरा, विद्या के महान केंद्र और मां सरस्वती (वाग्देवी) के प्राचीन मंदिर के रूप में करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र रहा है, जिसे अब देश की सबसे बड़ी पुरातात्विक संस्था से पूर्ण प्रशासनिक मान्यता मिल गई है।
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