Women empowerment in rural India through self-help groups, Krishi Sakhis, and frontline community cadres

ग्रामीण परिवर्तन के शिल्पकार: सामुदायिक कैडर बदल रहे भारत की तस्वीर

ग्रामीण परिवर्तन के जमीनी शिल्पकार: कैसे सामुदायिक कैडर बदल रहे हैं ग्रामीण भारत की तस्वीर”

नई दिल्ली : संतोष सेठ संपादक ( द पॉलिटिक्स अगेन )

ग्रामीण भारत आज परिवर्तन के एक नए युग का गवाह बन रहा है, और इस परिवर्तन की नींव में हैं – जमीनी स्तर के प्रशिक्षित कार्यकर्ता।

ये कार्यकर्ता, जिन्हें अक्सर ‘सामुदायिक कैडर’ या ‘फ्रंटलाइन वर्कर्स’ कहा जाता है, सरकारी योजनाओं को कागजों से निकालकर सीधे गांवों के अंतिम छोर तक पहुँचाने में एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं।

चाहे वह स्वास्थ्य हो, कृषि हो, स्वच्छता हो या वित्तीय समावेशन, इन जमीनी शिल्पकारों ने ग्रामीण भारत की तकदीर को नई दिशा दी है।

देश भर में 9 लाख से अधिक सामुदायिक संसाधन व्यक्ति (सीआरपी), 10.40 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ता और 10.58 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इस बड़े मिशन का हिस्सा हैं।

ये कार्यकर्ता न केवल योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाते हैं, बल्कि समुदायों को एकजुट कर उन्हें उनके अधिकारों और लाभों तक पहुँचाने में सक्रिय सहयोग करते हैं।

आजीविका का विस्तार: कृषि सखियों और सीआरपी की भूमिका

ग्रामीण भारत की आजीविका मुख्य रूप से कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर करती है। इसी को ध्यान में रखते हुए, लगभग 4.08 लाख ‘आजीविका सीआरपी’ (जिनमें कृषि सखी, पशु सखी, मत्स्य सखी और वन सखी शामिल हैं) महिलाओं और किसानों को तकनीकी और आजीविका सहायता प्रदान कर रहे हैं।

ये महिलाएं न केवल नई और टिकाऊ कृषि तकनीकों का प्रचार-प्रसार कर रही हैं, बल्कि पशुधन प्रबंधन और उत्पादों की बिक्री में भी किसानों की मदद कर रही हैं।

इसके अतिरिक्त, गैर-कृषि आजीविका को बढ़ावा देने के लिए ‘उद्योग सखियां’ और उद्यम संवर्धन के लिए सीआरपी (CRP-EP) नए उद्यमों की पहचान कर उन्हें ऋण और बाज़ार से जोड़ने का काम कर रहे हैं।

सरकार के प्रयासों से स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से लगभग 10 करोड़ ग्रामीण परिवारों को जोड़ा गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई ताकत मिली है।

वित्तीय सशक्तिकरण की नई लहर: बैंक सखी और बीसी सखी

ग्रामीण भारत में बैंकिंग सेवाओं की कमी हमेशा से एक बड़ी बाधा रही है। लेकिन, ‘बीसी सखी’ (बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट) और ‘बैंक सखी’ के रूप में प्रशिक्षित महिलाओं ने इस कमी को काफी हद तक दूर कर दिया है।

1.48 लाख से अधिक बीसी सखियां गाँव के स्तर पर खाता खोलने, पैसे जमा करने और निकालने जैसी सुविधाएं घर-घर तक पहुँचा रही हैं।

असम की देबश्री गोगोई की कहानी इस बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण है। एक ग्राहक सेवा बिंदु (CSP) चलाकर, देबश्री न केवल अपने गाँव के लोगों को वित्तीय सुविधाएं प्रदान कर रही हैं, बल्कि अपने लिए एक स्थायी आजीविका भी कमा रही हैं।

उनकी तरह, हजारों महिलाएं ग्रामीण वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत कर रही हैं और स्वयं सहायता समूहों को करोड़ों रुपये का बैंक ऋण दिलाने में मदद कर रही हैं।

स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता: घर-घर तक पहुँच

स्वास्थ्य और स्वच्छता किसी भी समुदाय के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इस क्षेत्र में आशा कार्यकर्ता (ASHA) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (AWW) फ्रंटलाइन पर डटी हुई हैं।

आशा कार्यकर्ता मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ हैं, जबकि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चों में कुपोषण से निपटने और उन्हें प्रारंभिक शिक्षा देने का काम कर रही हैं।

वहीं, ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत ‘स्वच्छाग्रही’ गाँवों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने और कचरा प्रबंधन में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बस्तर की ‘स्वच्छता दीदियों’ ने कचरे को समस्या से निकालकर संसाधन में बदल दिया है, जिससे न केवल गाँव स्वच्छ हुए हैं, बल्कि उन्हें अतिरिक्त आमदनी भी हुई है।

जल सुरक्षा और आवास: सपनों को साकार करते ‘जल मित्र’ और ‘आवास मित्र’

‘जल जीवन मिशन’ के तहत ग्राम जल और स्वच्छता समितियां (VWSC) और ‘नल जल मित्र’ गाँवों में पानी की आपूर्ति और उसके रखरखाव का प्रबंधन कर रहे हैं।

वहीं, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण’ (PMAY-G) के तहत ‘आवास मित्र’ गरीब परिवारों को पक्के घर बनवाने में मदद कर रहे हैं।

सुमति देबबर्मा जैसी हजारों महिलाओं का पक्के घर का सपना इन ‘आवास मित्रों’ के मार्गदर्शन और सहयोग से ही साकार हुआ है।

अभिसरण: सभी विकास योजनाओं का एक बिंदु पर मिलन

इन सभी कैडरों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ये अब केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। एक आशा कार्यकर्ता स्वच्छता के बारे में भी बता सकती है, और एक कृषि सखी वित्तीय साक्षरता पर भी बात कर सकती है।

इस दृष्टिकोण को ‘अभिसरण’ (Convergence) कहा जाता है। इसका मतलब है कि एक ही परिवार को स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका और आवास जैसी सभी आवश्यक सेवाएं एक साथ मिलें।

उत्तर प्रदेश की आरती की कहानी यह दर्शाती है कि कैसे एक महिला जो कभी आर्थिक रूप से कमजोर थी, वह स्वयं सहायता समूह से जुड़कर न केवल सशक्त बनी, बल्कि अपने पूरे समुदाय के विकास का माध्यम बन गई।

निष्कर्ष

ये जमीनी कार्यकर्ता ग्रामीण परिवर्तन की असली रीढ़ हैं। वे केवल सेवा प्रदाता नहीं हैं, बल्कि समुदायों के नेता, शिक्षक और बदलाव के वाहक (Change Agents) हैं।

जैसे-जैसे भारत एक विकसित राष्ट्र की ओर कदम बढ़ा रहा है, इन सामुदायिक संस्थानों और फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं में निवेश जारी रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यही मजबूत और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव तैयार कर रहे हैं।