देश में तेज हुआ आरक्षण विरोधी आंदोलन, 2027 के चुनावों पर असर
देश में जोर पकड़ रहा आरक्षण-विरोधी आंदोलन: ऑनलाइन से सड़कों तक सवर्णों का शक्ति प्रदर्शन, 2027 के चुनावों पर पड़ेगा सीधा असर”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
भारत की राजनीति में सबसे संवेदनशील और समाज को बांटने वाले मुद्दों में से एक—जाति-आधारित आरक्षण—पर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है।
देश भर में ऑनलाइन अभियानों से लेकर ज़मीनी स्तर तक आरक्षण-विरोधी आवाज़ें तेज़ी से संगठित और मुखर हो रही हैं।
सवर्णों और युवाओं का यह बढ़ता असंतोष न केवल सामाजिक समीकरणों को बदल रहा है, बल्कि 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती भी खड़ी कर रहा है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोर्चों पर लामबंदी
आरक्षण-विरोधी यह आंदोलन अब पहले की तरह बिखरा हुआ नहीं है, बल्कि इसे एक मजबूत आधार मिल रहा है:
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‘रिज़र्वेशन हटाओ आंदोलन’ (RHA): वेदांत नाम के एक छात्र द्वारा शुरू किए गए इस इंस्टाग्राम पेज के अब लगभग 5.9 मिलियन (59 लाख) फ़ॉलोअर्स हो चुके हैं। इस मंच ने पिछले हफ़्ते महाराष्ट्र के नागपुर में अपना पहला बड़ा ज़मीनी विरोध प्रदर्शन भी किया।
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दिग्गजों का मिल रहा साथ: RHA जैसे प्लेटफॉर्म्स से अब शिक्षाविद आनंद रंगनाथन, पत्रकार अजीत भारती और लेखिका अनुराधा तिवारी जैसी प्रमुख हस्तियां भी जुड़ रही हैं, जिन्होंने अपनी मांगों की एक स्पष्ट सूची जारी की है।
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युवाओं का आक्रोश: नीट (NEET) पेपर लीक मुद्दे पर टीवी डिबेट्स में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ बेबाकी से बोलने वाले युवा हर्ष दुबे रातों-रात सोशल मीडिया सेंसेशन बन गए हैं और अब नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शन की अनुमति का इंतज़ार कर रहे हैं।
किन घटनाओं ने भड़काई चिंगारी?
इस नए आंदोलन को हवा देने में पिछले कुछ हफ्तों की कई प्रमुख घटनाओं का योगदान है। CJP के नेतृत्व में चले विरोध-प्रदर्शनों (जिसके कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था) के बाद से माहौल गरमाया हुआ है।
इसके अलावा, UGC के जाति समानता नियमों को लेकर भी सवर्ण वर्गों में भारी आक्रोश दिखा। इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए “ऊंची जातियों” ने कहा कि यह मेरिट को कमज़ोर करने और सामाजिक विभाजन को गहरा करने की एक अनुचित कोशिश है।
जयपुर में करणी सेना का उग्र प्रदर्शन
आरक्षण-विरोधी इस लहर का असर ज़मीनी स्तर पर हिंसक रूप भी ले रहा है। हाल ही में जयपुर में ‘श्री राजपूत करणी सेना’ के सदस्यों ने UGC के नियमों के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया।
पुलिस के साथ हुई हिंसक झड़प में एक व्यक्ति की मौत का भी आरोप है। करणी सेना ने खुलेआम कसम खाई है कि वे आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में सत्ताधारी पार्टी (BJP) का बहिष्कार करेंगे।
2027 के विधानसभा चुनावों पर क्या होगा असर?
आगामी 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसके बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी मतदान होगा।
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विपक्ष का जाति कार्ड: पिछले चुनावों में राहुल गांधी के “जितनी आबादी, उतना हक” और अखिलेश यादव के “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन ने खासी सुर्खियां बटोरी थीं।
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सत्ता पक्ष के लिए चुनौती: विपक्ष के इस जातिगत ध्रुवीकरण के जवाब में अब सवर्णों का यह संगठित और उग्र असंतोष सत्ताधारी पार्टियों के लिए ‘दोधारी तलवार’ बन गया है।
राजनेता भले ही इस गरमाती बहस से दूर रहने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन यह स्पष्ट है कि 2027 का चुनाव केवल विकास के एजेंडे पर नहीं, बल्कि जाति और आरक्षण के इसी नए राजनीतिक अखाड़े में लड़ा जाएगा।











