ब्रिक्स की सफलता से बौखलाया अमेरिका: भारत को 100% टैरिफ की धमकी
ब्रिक्स की भव्य सफलता से बौखलाया अमेरिका: रूसी तेल की आड़ में भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, जानें क्या हैं इसके मायने”
नई दिल्ली : संतोष सेठ, संपादक (THE POLITICS AGAIN)
भारत की मेजबानी में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलता ने वैश्विक कूटनीति में एक नया अध्याय लिख दिया है।
इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान समेत दुनिया के कई प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने हिस्सा लिया।
मंच पर ईरान और यूएई की बैठक जैसी अहम कूटनीतिक हलचलें भी देखने को मिलीं। लेकिन, इस शानदार आयोजन और भारत-रूस की गहरी दोस्ती से पश्चिमी देश, विशेषकर अमेरिका, अंदर ही अंदर तिलमिला उठा है।
अमेरिका अपनी यह ‘खुन्नस’ सीधे तौर पर तो नहीं दिखा रहा, लेकिन उसने कूटनीतिक और आर्थिक प्रहार का रास्ता चुना है।
अमेरिकी संसद (प्रतिनिधि सभा) ने ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ पारित किया है।
इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार मिल गया है कि वे रूस से तेल या गैस खरीदने वाले शीर्ष 5 देशों (जिनमें भारत और चीन शामिल हैं) पर 100% तक का भारी आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकते हैं।
अमेरिका के इस कड़े और आक्रामक फैसले के पीछे असली कारण क्या हैं?
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‘डीडॉलराइजेशन’ का खौफ: ब्रिक्स देशों ने हालांकि अभी तक कोई नई साझा मुद्रा नहीं बनाई है, लेकिन स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की बढ़ती चर्चाओं ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है।
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अमेरिका को डर है कि डॉलर का वैश्विक दबदबा कम हुआ तो उसकी आर्थिक महाशक्ति की हैसियत कमजोर पड़ जाएगी।
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व्यापार घाटा (Trade Deficit): अमेरिका हर साल भारी मात्रा में आयात करता है। इस बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने के लिए अमेरिका दूसरे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की रणनीति अपना रहा है।
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‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति: अमेरिकी प्रशासन घरेलू कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर आक्रामक रूप से काम कर रहा है।
भारत के लिए इसके मायने और आर्थिक खतरे
यह नया अमेरिकी विधेयक भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का 88% आयात करता है, जिसमें वित्त वर्ष 2026 में रूस की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई (40.8 अरब डॉलर) रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ट्रंप 100% टैरिफ लागू करते हैं, तो इसका सीधा असर भारत के विकास और निर्यात पर पड़ेगा।
‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने इसे एकतरफा व्यापार समझौते (BTA) के लिए भारत पर दबाव बनाने की खतरनाक चाल बताया है।
यदि यह टैरिफ लागू होता है, तो भारत से अमेरिका जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स (स्मार्टफोन), फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न-आभूषण और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के निर्यात को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।
क्या भारत में पेट्रोल की कीमतें बढ़ेंगी?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका असर तुरंत नहीं होगा, क्योंकि पुरानी बुकिंग की डिलीवरी (45-60 दिन की विंड-डाउन अवधि) होती रहेगी।
भारत ने पहले ही पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से तेल आयात के विकल्प खुले रखे हैं। हाल ही में वेनेजुएला और यूएई से तेल आयात में भारी वृद्धि भी दर्ज की गई है। सवाल सिर्फ यह रहेगा कि नए स्रोतों से तेल किस कीमत पर मिलता है।
भारत का दो टूक और स्पष्ट जवाब
अमेरिकी दबाव के आगे न झुकते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की ‘ऊर्जा सुरक्षा’ और अपने ‘आर्थिक हितों’ की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
भारत ने अमेरिका को साफ कर दिया है कि हम युद्ध की फंडिंग के लिए नहीं, बल्कि अपनी जनता को किफायती ऊर्जा देने के लिए रूसी तेल खरीदते हैं।
भारत सरकार ने यह भी कहा है कि वह इस संभावित संकट से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए स्रोतों में विविधता लाती रहेगी।











