पश्चिम बंगाल चुनाव : वोटर लिस्ट की सफाई से बदला चुनावी गणित
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: वोटर लिस्ट की ‘सफाई’ से बदला कोलकाता का गणित, 11 सीटों पर नींद उड़ाने वाला है नया ‘सियासी तिलिस्म’
कोलकाता: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल के चुनावी समर में इस बार लड़ाई केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के पन्नों पर भी लड़ी जा रही है।
पहले चरण में 90 प्रतिशत से ज्यादा मतदान के जादुई आंकड़े ने जो राजनीतिक तिलिस्म बुना था, अब महानगर कोलकाता की दहलीज पर आकर वह एक नए सियासी बवंडर का रूप ले रहा है।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची के विशेष संशोधन (SIR) की छलनी से वोटरों को छानने के बाद जो तस्वीर उभरी है, उसने सत्ता के गलियारों में बैठे धुरंधरों की नींद उड़ा दी है।
कोलकाता की उदासीनता और नया अंकगणित
बंगाल में कई दशकों से मत प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा (80% से ऊपर) रहा है, लेकिन महानगर कोलकाता इस मामले में हमेशा उदासीन रहा है।
यहां मतदान कभी 60-65% के आंकड़े को पार नहीं कर पाया। हालांकि, दूसरे चरण में कोलकाता की जिन 11 सीटों पर चुनाव होना है, वहां चुनाव आयोग की प्रशासनिक सफाई के बाद एक नया ही गणित उभरकर सामने आया है।
इस नए अंकगणित की गहराई में उतरने पर पता चलता है कि मतदाता सूची से ‘भूतिया’ और फर्जी वोटरों के नाम कटने से कुल वोटरों का आधार (Base) काफी छोटा हो गया है।
स्थिति यह है कि अगर एक भी नया मतदाता घर से न निकले और सिर्फ 2024 के लोकसभा चुनाव के बराबर ही वोट पड़ें, तो भी मतदान 90-93% की आसमानी ऊंचाइयों को छू लेगा।
आंकड़ों की सर्जिकल स्ट्राइक: 3 विधानसभाओं का उदाहरण
कोलकाता की सीटों पर आंकड़ों का यह जादुई इंद्रजाल कुछ इस तरह है:
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चौरंगी विधानसभा: 2024 के चुनाव में यहां कुल 2,09,713 पंजीकृत मतदाता थे और 55.40% मतदान हुआ था। अब चुनाव आयोग की सफाई के बाद लगभग 83,364 मतदाता (40%) सूची से बाहर हो गए हैं और अब केवल 1,26,349 मतदाता बचे हैं।
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यदि इस बार भी 2024 के बराबर ही वोट पड़े, तो कम आधार के कारण मतदान प्रतिशत स्वतः बढ़कर 91.96% हो जाएगा।
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एंटाली विधानसभा: 2024 में यहां 2,36,126 मतदाता थे, जो छंटनी के बाद घटकर 1,78,877 रह गए हैं।
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अगर एक भी नया वोटर न निकले तो भी मतदान का आंकड़ा 93.43% के अकल्पनीय स्तर पर पहुंच जाएगा।
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जोड़ासांको विधानसभा: यहां अमूमन कम वोटिंग होती थी। अब वोटर की संख्या 1,97,388 से घटकर 1,22,668 रह गई है।
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इसका सीधा मतलब है कि बिना एक भी नया वोट बढ़े, यहां का मतदान प्रतिशत 86.22% दर्ज होगा।
अदृश्य वोटों का मनोवैज्ञानिक युद्ध: TMC बनाम BJP
आंकड़ों की इस छलांग ने बंगाल की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ प्रतिशत का उछाल नहीं है, बल्कि उन ‘अदृश्य वोटों’ की कहानी है, जिन्हें यहां हार-जीत का मुख्य किरदार माना जाता है।
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तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बेचैनी: सत्तारूढ़ दल इसे महज एक ‘पाटीगणित’ (अंकगणित) बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहा है।
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TMC का तर्क है कि मतदाता सूची से नाम कटने का गुस्सा लोगों में है और यह सीधे तौर पर भाजपा के खिलाफ जाएगा।
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हालांकि, पर्दे के पीछे की बेचैनी कुछ और ही कहानी बयां करती है। जमीनी समीकरणों में पैदा हुआ यह खालीपन उनके कैडर आधारित मतदान तंत्र को एक बड़ी चुनौती दे रहा है।
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भाजपा (BJP) का उत्साह: भगवा खेमे के लिए ये आंकड़े मजबूती देने वाले हैं। पूरे कोलकाता में पिछले चुनाव में 11 में से एक भी सीट उनके पास नहीं थी।
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अब भाजपा का मानना है कि बंगाल के चुनावों में हर सीट पर 2 से 5 प्रतिशत का जो ‘छप्पा वोट’ (फर्जी मतदान) का अभिशाप था, उसे चुनाव आयोग ने धो डाला है।
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केंद्रीय बलों के साये में अगर यह फर्जीवाड़ा रुकता है और असली मतदाता थोड़े भी अतिरिक्त जोश के साथ बाहर निकलता है, तो भाजपा अपनी जीत सुनिश्चित मान रही है।
निष्कर्ष: खामोश लहर या आंकड़ों का इंद्रजाल?
स्थानीय दुकानदारों और जानकारों का कहना है कि लोग तो वही हैं, लेकिन सूची छोटी हो गई है। यही वजह है कि वोटिंग पहले जितनी होने पर भी प्रतिशत 90 के पार जाता हुआ दिखेगा।
यह महज एक सांख्यिकीय उछाल है या फिर परिवर्तन की कोई गहरी खामोश लहर, यह तो 2026 के ईवीएम खुलने पर ही तय होगा।
लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि महानगर की इन 11 वीआईपी सीटों पर अब जो भी जीतेगा, वह छप्पा वोटों से नहीं, बल्कि इस नए, पारदर्शी और निर्मम अंकगणित की कसौटी पर खरा उतर कर ही जीतेगा।











