अगस्त 1947 का विभाजन मानव इतिहास का सबसे बड़ा और दर्दनाक विस्थापन था, जिसमें लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और सांप्रदायिक हिंसा में 10 लाख से अधिक जानें गईं।
14 अगस्त 1947: विभाजन की विभीषिका, जब आजादी के जश्न पर हावी हो गया था बंटवारे का खून और दर्द”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
15 अगस्त 1947… यह वह तारीख है जब भारत ने करीब 200 सालों की गुलामी के बाद खुली हवा में सांस ली थी।
पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, लेकिन इस आजादी की कीमत 14 अगस्त की उस काली रात ने चुकाई थी, जिसने भारत माता के सीने पर एक ऐसी लकीर खींच दी जो आज तक रिस रही है।
यह केवल एक भू-भाग का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी और ‘विभाजन की विभीषिका’ थी, जिसने रातों-रात लाखों परिवारों को बेघर, बेसहारा और अनाथ कर दिया।
अगस्त 1947 में जब सिरिल रेडक्लिफ ने भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा (रेडक्लिफ लाइन) खींची, तो सदियों से एक साथ रह रहे लोगों को अचानक पता चला कि वे अब अपने ही घर में शरणार्थी बन गए हैं।
लाखों लोगों का पलायन: इतिहासकार मानते हैं कि इस दौरान लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा के इस पार या उस पार जाना पड़ा। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन था।
पैदल और ट्रेनों का सफर: लोग बैलगाड़ियों, ट्रकों और पैदल ही मीलों का सफर तय कर रहे थे। दोनों तरफ से आने वाली ट्रेनें खचाखच भरी होती थीं,
लेकिन जब वे स्टेशन पर पहुंचती थीं, तो उनमें अक्सर यात्रियों की जगह केवल लाशें होती थीं। इन ‘ब्लड ट्रेन्स’ (Blood Trains) ने उस क्रूरता की गवाही दी, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
विभाजन की घोषणा के साथ ही पंजाब और बंगाल के प्रांत सांप्रदायिक दंगों की आग में जल उठे। जो हिंदू, मुस्लिम और सिख कल तक पड़ोसी और भाई हुआ करते थे, वे अचानक एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
कत्लेआम: एक अनुमान के मुताबिक, इस विभाजन की हिंसा में 10 लाख से 20 लाख लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। गांव के गांव जला दिए गए और बस्तियां श्मशान में तब्दील हो गईं।
महिलाओं पर अत्याचार: विभाजन की सबसे भारी कीमत महिलाओं ने चुकाई। लगभग 75,000 से 1 लाख महिलाओं का अपहरण किया गया,
उनके साथ अमानवीय अत्याचार हुए और कई महिलाओं को उनके ही परिवार वालों ने ‘सम्मान’ बचाने के नाम पर मौत के घाट उतार दिया।
जो लोग अपनी जान बचाकर सीमा पार करने में सफल रहे, उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। उन्हें महीनों तक बिना बुनियादी सुविधाओं के टेंट वाले शरणार्थी शिविरों (Refugee Camps) में रहना पड़ा।
उनके पास न पैसा था, न रोजगार और न ही सिर छुपाने के लिए पक्की छत। हालांकि, इन्हीं विस्थापितों ने अपने अदम्य साहस और खून-पसीने से अपनी जिंदगी को शून्य से फिर से शुरू किया और आज वे भारत के नवनिर्माण के मजबूत स्तंभ हैं।
14 अगस्त 1947 की वह त्रासदी केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक घटना नहीं है, बल्कि यह वह गहरा आघात है जिसका दर्द कई पीढ़ियों ने झेला है।
यह विभीषिका हमें याद दिलाती है कि नफरत और सांप्रदायिक उन्माद का अंजाम कितना भयावह हो सकता है।
इसी दर्द और संघर्ष को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने हर साल 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ (Partition Horrors Remembrance Day) के रूप में मनाने का फैसला किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां नफरत को भूलकर भाईचारे का मूल्य समझ सकें।
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