11वें आयुर्वेद दिवस पर भारत की 5,000 वर्ष पुरानी चिकित्सा का आधुनिक अवतार; देशभर में 12,000 से अधिक आयुष आरोग्य मंदिर, कैशलेस स्वास्थ्य बीमा और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के साथ आयुर्वेद बना मुख्यधारा की चिकित्सा।
आयुर्वेद का स्वर्णिम युग: 11वें आयुर्वेद दिवस पर भारत की 5000 पुरानी चिकित्सा का आधुनिक अवतार, स्वास्थ्य बीमा से लेकर WHO तक डंका
नई दिल्ली : द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की विशेष रिपोर्ट
11वें आयुर्वेद दिवस (23 सितंबर) के अवसर पर भारत अपनी 5,000 वर्ष पुरानी चिकित्सा पद्धति को साक्ष्य-आधारित विज्ञान के रूप में स्थापित कर रहा है।
‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमन’ के मूल सिद्धांत पर आधारित आयुर्वेद अब केवल पारंपरिक ज्ञान तक सीमित नहीं है,
बल्कि डिजिटल परामर्श, स्वास्थ्य बीमा और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़कर आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल का अभिन्न अंग बन चुका है।
राष्ट्रीय आयुष मिशन (NAM) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के माध्यम से सरकार ने आयुर्वेद को मुख्यधारा की चिकित्सा में शामिल किया है।
2014-15 से 2025-26 के बीच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 6,406.99 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की गई है।
आयुर्वेद दिवस के अवसर पर भारत अपनी 5,000 वर्ष पुरानी इस चिकित्सा पद्धति को साक्ष्य आधारित वैज्ञानिक शोध के माध्यम से दैनिक और आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल का हिस्सा बनाने के एक दशक का उत्सव मना रहा है।
आज देश भर के सरकारी क्लीनिक और अस्पताल नियमित चिकित्सा देखभाल के साथ-साथ आयुर्वेदिक उपचार भी प्रदान कर रहे हैं।
मुफ्त ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श, बीमा कवरेज और उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान इन प्राचीन आरोग्य पद्धतियों को सभी के लिए सुरक्षित और सुलभ बना रहे हैं।
मजबूत वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से भारत दुनिया को यह दिखा रहा है कि स्वस्थ भविष्य के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान किस प्रकार एक साथ मिलकर काम कर सकते हैं।
आयुर्वेद जीवन का एक विज्ञान है जो 5,000 साल से भी ज़्यादा पुराना है। इसकी जड़ें ऋग्वेद से जुड़ी हैं। आयुर्वेद शब्द आयु (जीवन) और वेद (विज्ञान) से मिलकर बना है।
इसका मूल उद्देश्य ‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमन’ है। इसका मतलब है- स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और बीमार व्यक्ति के विकार (रोग) को दूर करना।
आयुर्वेद सच्ची स्वास्थ्य स्थिति को चयापचय तत्वों के सामंजस्यपूर्ण संतुलन के रूप में परिभाषित करता है।
इस संतुलन के लिए जैव-ऊर्जा (दोष), चयापचय अग्नि (अग्नि), शारीरिक ऊतकों (धातु) और अपशिष्ट निष्कासन (मल) के साथ-साथ एक शांत आत्मा (आत्मा), मस्तिष्क (मानस) और इंद्रियों (इंद्रियों) के बीच इष्टतम तालमेल आवश्यक होता है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में वर्णित वनस्पतियों, पशु उत्पादों और खनिजों के औषधीय एवं चिकित्सीय गुणों का उपयोग करते हुए आयुर्वेद आज भी अपनी प्राचीनता के साथ आधुनिक प्रासंगिकता बनाए हुए है।
इस विज्ञान का मुख्य सिद्धांत यह है कि अच्छे स्वास्थ्य का मतलब है व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा का अपने आस-पास की दुनिया के साथ पूरी तरह से तालमेल होना।
सरकार इस विरासत को सम्मान और बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक संतुलन को प्रतिबिंबित करने वाले शरद विषुव के अवसर पर हर साल 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाती है।
बेहतर कल के लिए आयुर्वेद की थीम के अंतर्गत सरकार पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा को पुनर्जीवित करने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति का क्रियान्वयन कर रही है।
सरकार आयुर्वेद क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिए एक इकोसिस्टम स्थापित कर रही है। यह शिक्षा के आधुनिकीकरण, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान और विकास, औषधि मानकों की स्थापना, वैश्विक स्तर पर पहुंच तथा आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ एकीकृत करने के माध्यम से किया जा रहा है।
सरकार का यह समग्र दृष्टिकोण आयुर्वेद तथा योग व प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्धा और होम्योपैथी समेत सभी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता के साथ- साथ आगे बढ़ रहा स्वास्थ्य अवसंरचना का निर्माण
सरकार राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के माध्यम से आयुर्वेद समेत पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का विस्तार और आधुनिकीकरण तथा मुख्यधारा की सार्वजनिक चिकित्सा में उनका एकीकरण कर रही है।
आयुष मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित ये दोनों राष्ट्रीय मिशन देश भर में आयुष क्लीनिक, अस्पताल, विभाग और सामुदायिक सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित कर रहे हैं।
एनएएम देश में आयुष स्वास्थ्य सेवा के विस्तार और एकीकरण को गति दे रहा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच परंपरागत चिकित्सा प्रणालियों में आयुष स्वास्थ्य सेवा को शामिल करने के लिए एनएएम के माध्यम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 6,406.99 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की है।
एनएचएम भी इनमें से कुछ पहलकदमियों का समर्थन कर रहा है जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं-
मौजूदा स्वास्थ्य क्लीनिकों (डिस्पेंसरियों) का आधुनिकीकरण और उन्नयन किया जा रहा है। उन्हें बेहतर सुविधाओं से युक्त आरोग्य केंद्रों में परिवर्तित कर आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) नाम दिया गया है।
यह एनएचएम और एनएएम का साझा प्रयास है। एनएचएम आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के वित्त पोषण और आयुष स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण में सहायता देता है।
दूसरी ओर एनएएम इन आरोग्य मंदिरों के लिए अवसंरचना, उपकरण/फर्नीचर और दवाएं प्रदान करता है।
19 सितंबर, 2026 के आंकड़ों के अनुसार देश में 12,260 आयुष एएएम काम कर रहे हैं। एनएएम का लक्ष्य 12,500 केंद्र स्थापित करने का है।
एनएचएम के माध्यम से इन आयुष एएएम को अन्य सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के साथ भी एक ही जगह स्थापित किया जा रहा है।
एनएचएम देश भर में 13,249 सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सामान्य चिकित्सा देखभाल के साथ ही आयुष सेवाएं भी प्रदान करने में मदद करता है।
6,302 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र
3,191 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
475 जिला अस्पताल
3,281 अन्य स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाएं
सरकार विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यरत 25,322 आयुष डॉक्टरों और 5,666 आयुष अर्द्धचिकित्साकर्मियों के वेतन के लिए धन उपलब्ध कराती है।
एक प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक (आयुर्वेद, मेडिसिन और सर्जरी में स्नातक) गांव के स्तर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रबंधन के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी बन कर स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है।
स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों समेत सामान्य सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में पारंपरिक चिकित्सा काउंटर और डॉक्टर उपलब्ध कराना।
मौजूदा अस्पतालों और क्लीनिकों का उन्नयनः पारंपरिक चिकित्सा के अस्पतालों और क्लीनिकों की मरम्मत और उनका उन्नयन।
बेहतर सुविधाओं का निर्माणः जर्जर हो चुके क्लीनिक भवनों को ठीक करना और क्लीनिकों को किराए की जगहों से स्थायी स्थानों पर ले जाना। साथ ही उन क्षेत्रों में क्लीनिक बनाना जहां वर्तमान में पारंपरिक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
नए एकीकृत अस्पतालों का निर्माणः 10, 30 या 50 बिस्तरों वाले ऐसे नए अस्पतालों की स्थापना करना जो एक ही छत के नीचे विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को जोड़ें।
आवश्यक औषधियां उपलब्ध करानाः सरकारी क्लीनिकों, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को आवश्यक पारंपरिक औषधियों की निरंतर और मुफ्त आपूर्ति सुनिश्चित करना।
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमः पारंपरिक आरोग्य और निवारक देखभाल से संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान चलाना।
जागरूकता अभियानः स्वास्थ्य, आरोग्य और उपलब्ध उपचारों के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए कार्यक्रम, विज्ञापन और सामुदायिक पहुंच कार्यक्रम तैयार करना।
नए मेडिकल कॉलेजों का शुभारंभः उन राज्यों और क्षेत्रों में पारंपरिक चिकित्सा के नए कॉलेज बनाना जहां छात्रों के लिए पर्याप्त सार्वजनिक विकल्प उपलब्ध नहीं हैं।
मेडिकल स्कूलों में सुधारः मौजूदा कॉलेजों में उच्चतर डिग्रियों, फार्मेसी कार्यक्रमों और पैरामेडिकल प्रशिक्षण को शामिल करते हुए परिसर की सुविधाओं, कक्षाओं और उपकरणों का उन्नयन है।
सरकार इन केंद्र सरकार के अस्पतालों में एकीकृत चिकित्सा विभाग शुरू करके आयुष देखभाल का विस्तार भी कर रही है:
ये विभाग एक पूरी तरह से कार्यात्मक पंचकर्म इकाई सहित निवारक, संवर्धनात्मक और उपचारात्मक चिकित्सा सेवाएं प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, आयुष अनुसंधान परिषदों द्वारा विस्तारित ओपीडी सेवाएं इन जगहों पर उपलब्ध हैं:
वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल,
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल।
नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में आयुष सेवाएं भी उपलब्ध हैं।
सरकार ‘ई-संजीवनी’ नाम की एक मुफ़्त टेलीमेडिसिन सेवा देती है, जिसका फ़ायदा 50 करोड़ से ज़्यादा मरीज़ उठा चुके हैं।
पारंपरिक चिकित्सा के अलावा, ‘ई-संजीवनी’ आयुष ओपीडी सेवाएँ भी देती है, जिससे मरीज़ सीधे इस प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से आयुर्वेद (और अन्य आयुष सेवाओं) के विशेषज्ञ डॉक्टरों से ऑनलाइन परामर्श ले सकते हैं।
सरकार ने स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत आयुष उपचारों को शामिल करने के लिए बीमा नीतियों को अपडेट किया है।
वर्ष 2024 में, भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने अनिवार्य किया कि सभी बीमा कंपनियों को बोर्ड द्वारा स्वीकृत अंडरराइटिंग नीतियों (जोखिम मूल्यांकन के नियम) के तहत आयुर्वेद सहित चिकित्सा की सभी पद्धतियों को कवर करने वाले उत्पाद या ऐड-ऑन प्रदान करना आवश्यक है।
10 फरवरी, 2026 को, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए), नई दिल्ली ने जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (जीआईसी) के साथ एक सामान्य सूचीबद्ध (कॉमन एम्पैनलमेंट) समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए।
इसके तहत एआईआईए को भारत की सभी 32 सामान्य बीमा कंपनियों के साथ सूचीबद्ध किया गया, जो किसी आयुष संस्थान द्वारा कैशलैश इलाज के लिए सार्वभौमिक सूचीबद्ध समझौता करने का पहला अवसर है।
एआईआईए ने लाभार्थियों को बीमा से जुड़े सवालों में सहायता करने और आयुष बीमा कवरेज के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए एक समर्पित आयुष स्वास्थ्य बीमा हेल्पलाइन (1800-11-0008) भी शुरू की।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा अंतर्राष्ट्रीय रोग वर्गीकरण के 11वें संशोधन (आईसीडी-11) के मॉड्यूल में शामिल किए जाने के कारण आयुर्वेद की शब्दावली को अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल गई है।
इस कदम से दुनिया भर के चिकित्सक अब मानक कोड का उपयोग करके एएसयू (आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी) निदान को दर्ज करने में सक्षम होंगे, जिससे विभिन्न क्षेत्रों और स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच एक समान अर्थ समझा जा सकेगा।
आयुष स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार के साथ-साथ इसे चलाने के लिए आयुष स्वास्थ्य कर्मियों की भी आवश्यकता होती है।
एनएएम के तहत आयुर्वेद शिक्षा के विस्तार के लिए स्नातक और स्नातकोत्तर संस्थानों की स्थापना करने का प्रावधान है, जिनमें फ़ार्मेसी और पैरा-मेडिकल कार्यक्रम भी शामिल हैं।
एनएएम के तहत देशभर में 17 आयुष कॉलेजों की स्थापना को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 12 कॉलेजों का फोकस आयुर्वेदिक शिक्षा को बढ़ावा देने पर है।
आयुर्वेद शिक्षण संस्थान सरकारी और निजी दोनों तरह के आयुर्वेद शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ रही है और यह संस्थान इस क्षेत्र को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं।
593 आयुर्वेद कॉलेज,
45,245 स्नातक आयुर्वेद की सीटें और
5,673 स्नातकोत्तर आयुर्वेद की सीटें हैं।
नैदानिक प्रशिक्षण और शैक्षिक विस्तार के अलावा, समकालीन चिकित्सा प्रणाली में आयुर्वेद की विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए सख़्त, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान और वैज्ञानिक सत्यापन की आवश्यकता है।
आयुर्वेद में अनुसंधान और विकास को आगे बढ़ाने के लिए, सरकार कई योजनाएं चलाती है। इन योजनाओं का मकसद पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक बनाना और दवा विकास को बेहतर करना है।
इन प्रयासों के केंद्र में आयुष मंत्रालय द्वारा वर्ष 2021-22 में शुरू की गई ‘आयुर्ज्ञान’ योजना अहम है, जो अनुसंधान एवं विकास पहलों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
34 परियोजनाओं में कुल 17.79 करोड़ रुपये के अनुसंधान निधि पूल में से आधे से अधिक हिस्सा आयुर्वेद का है, जिसे 17 समर्पित परियोजनाओं के लिए 9.38 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
वर्ष 2026 की शुरुआत तक, 11 विशिष्ट अनुसंधान परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी थी, जिनमें से छह परियोजनाओं का फोकस पांच प्रमुख एकल आयुर्वेदिक वनस्पतियों के लिए सुरक्षा और असर से जुड़े दस्तावेज़ तैयार करने पर था।
ये प्रयास बढ़ती अकादमिक उपलब्धियों को दर्शाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 2014-15 से 2025-26 के बीच 33 आयुर्वेद विशिष्ट प्रकाशन और 2001-02 से अब तक कुल 77 शोध प्रकाशन सामने आए हैं।
आयुर्ज्ञान योजना के पूरक के रूप में ‘आयुर स्वास्थ्य योजना’ (2021-2026) शुरू की गई, जो आयुष नैदानिक और औषधि अनुसंधान, शिक्षा, सार्वजानिक स्वास्थ्य पहलों तथा सुविधाओं को ‘उत्कृष्टता केंद्र’ के रूप में अपग्रेड करने के लिए सरकारी या गैर-लाभकारी आयुष संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
2025 के अंत तक सहायता प्राप्त 25 परियोजनाओं में से 22 परियोजनाएं आयुर्वेद हस्तक्षेपों पर केंद्रित थीं या उनमें आयुर्वेद को शामिल किया गया था।
इस योजना के तहत 28 विशेष उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए, जिनमें से 22 केंद्र आयुर्वेद-केंद्रित अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए समर्पित हैं।
संस्थागत स्तर पर, केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस)—जो आयुष मंत्रालय के तहत पांच स्वायत्त अनुसंधान निकायों में से एक है—देशभर में आयुर्वेदिक अध्ययनों का वैज्ञानिक संयोजन, समन्वय और प्रचार-प्रसार करती है।
30 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संस्थानों के नेटवर्क के माध्यम से कार्य करते हुए, सीसीआरएएस फेलोशिप, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और ‘स्पार्क’ कार्यक्रम जैसी लक्षित छात्र पहलों के माध्यम से अनुसंधान क्षमता का निर्माण करती है।
आयुर्वेद अनुसंधान ज्ञान छात्रवृत्ति कार्यक्रम (स्टूडेंटशिप प्रोग्राम फॉर आयुर्वेद रिसर्च केन) स्नातक आयुर्वेद छात्रों के बीच शोध में रुचि और योग्यता को बढ़ावा देता है।
यह कार्यक्रम छात्रों को आयुर्वेद में अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अल्पकालिक स्वतंत्र परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है।
वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच, ‘स्पार्क’ कार्यक्रम के माध्यम से 289 आयुर्वेद कॉलेजों ने लाभ उठाया।
वैज्ञानिक जानकारी को सभी तक पहुँचाने के लिए, सीसीआरएएस ने मार्च 2026 में ‘अनुवादिनी एआई’ के साथ साझेदारी की—जो शिक्षा मंत्रालय के एआईसीटीई द्वारा विकसित एक कृत्रिम मेधा अनुवाद प्लेटफॉर्म है।
इस सहयोग के माध्यम से, सीसीआरएएस अपने व्यापक शोध परिणामों, शैक्षिक संसाधनों और त्रैमासिक चिकित्सा पत्रिकाओं का 13 क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रहा है।
भाषा की बाधाओं को तोड़कर, यह पहल आयुर्वेदिक चिकित्सा अनुसंधान तक पहुँच को आसान बनाती है,
जिससे यह सुनिश्चित होता है कि पूरे भारत में छात्र, चिकित्सक और आम लोग इन वैज्ञानिक जानकारियों को आसानी से पढ़ और समझ सकें।
सरकार औषधीय जड़ी-बूटियों के संरक्षण, खेती और प्रसंस्करण के लिए किसानों और अनुसंधान निकायों को सक्रिय रूप से सहयोग देती है।
यह काम आपूर्ति श्रृंखला की कमियों को दूर करके, किसानों को प्रोत्साहन देकर, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाकर और फार्मास्युटिकल मानकों को बनाए रखकर किया जाता है।
जैसे-जैसे आयुर्वेद बाजार में उछाल आ रहा है, सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए एक कानूनी ढांचा भी स्थापित कर रही है कि उत्पाद उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित हों।
आयुर्वेदिक दवाओं को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और औषधि नियमावली, 1945 के तहत सख्ती से विनियमित किया जाता है।
निर्माताओं के लिए अच्छी विनिर्माण प्रक्रिया (जीएमपी) का पालन करना, दवाओं की सुरक्षा एवं प्रभावकारिता साबित करना और भेषजसंहिता के मानकों को पूरा करना अनिवार्य है।
सरकारी औषधि निरीक्षक गुणवत्ता नियंत्रण बनाए रखने के लिए नियमित रूप से नमूने एकत्र करते हैं और उनका परीक्षण करते हैं।
इस व्यवस्था को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के भीतर स्थापित एक विशेष आयुष विभाग से मदद मिलती है।
अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, सरकार ने दवा निर्माण लाइसेंस आवेदनों की कागजरहित प्रसंस्करण और निरंतर निगरानी के लिए ‘ई-औषधि’ पोर्टल शुरू किया।
आयुर्वेद आहार
इन सुरक्षा सिद्धांतों को औषधियों से आगे पोषण के क्षेत्र तक विस्तारित करते हुए, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से आयुर्वेद आहार के लिए एक मानकीकृत विनियमन लागू किया है।
यह पहल प्रामाणिक शास्त्रीय ग्रंथों के आधार पर प्रामाणिक आयुर्वेदिक आहार उत्पादों की एक सूची तैयार करती है।
यह सूची पारंपरिक खाद्य निर्माताओं के लाइसेंस और पंजीकरण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पारंपरिक खाद्य निर्माताओं के लिए एक पारदर्शी और विनियमित क्षेत्र बनाती है, जिससे भारत और दुनिया भर में उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ता है।
आयुष को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने और बाज़ार में एकीकृत करने के लिए, सरकार ने दुनिया भर में रणनीतिक द्विपक्षीय साझेदारियां, अनुसंधान सहयोग और शैक्षिक आदान-प्रदान की व्यवस्था की है।
यह विभिन्न देशों के बीच समझौतों, अनुसंधान सहयोग, शैक्षिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों और दवाओं के वैश्विक प्रमाणन के माध्यम से किया जा रहा है।
रणनीतिक अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों, सहयोगात्मक अनुसंधान ढाँचों, अकादमिक पीठ की नियुक्तियों और विशेष छात्रवृत्ति कार्यक्रमों के माध्यम से, देश समग्र स्वास्थ्य देखभाल और एकीकृत चिकित्सा के क्षेत्र में एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति स्थापित कर रहा है। इसके तहत भारत ने विभिन्न समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं, जैसे:
2025-26 में अंगोला, कजाकिस्तान और तंजानिया के साथ 3 समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए; घाना, दक्षिण अफ्रीका, रीयूनियन द्वीप, जर्मनी, मलेशिया और मंगोलिया के संस्थानों के साथ 6 संस्थान-स्तरीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए;
और ओमान के साथ अकादमिक पीठ के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।
43 देशों में 46 आयुष सूचना केंद्र स्थापित किए गए हैं।
अंतर्राष्ट्रीय आयुष फेलोशिप/छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत विदेशी नागरिकों को 104 छात्रवृत्तियां प्रदान की गईं।
भारत अब पारंपरिक चिकित्सा में नीति और मानकों का एक वैश्विक केंद्र बन चुका है। दिसंबर 2025 में, नई दिल्ली के भारत मंडपम में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) वैश्विक शिखर सम्मेलन’ आयोजित किया गया।
इस शिखर सम्मेलन में 100 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधि और 22 स्वास्थ्य मंत्री शामिल हुए। इसका विषय था – “संतुलन की पुनर्स्थापना: स्वास्थ्य और आरोग्य का विज्ञान और अभ्यास”।
प्रतिभागियों ने दिल्ली घोषणापत्र को अपनाया, जो सदस्य राज्यों को सिद्ध वैज्ञानिक तरीकों के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
कड़े गुणवत्ता और प्रशिक्षण मानकों का निर्धारण भारत की वैश्विक रणनीति का अहम हिस्सा है। गुजरात के जामनगर में स्थित डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र एक प्राथमिक अनुसंधान और नीति निर्धारण के केंद्र के रूप में कार्य करता है।
आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद और यूनानी के लिए मानक प्रशिक्षण मार्गदर्शिकाएँ तैयार करने के लिए डब्ल्यूएचओ के साथ साझेदारी की है।
इसने 17 देशों के साथ हर्बल दवा विनियमन पर कार्यशाला भी आयोजित की और अमेरिका में ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन द साइंस ऑफ बोटैनिकल्स’ में शोध प्रस्तुत किया। सांस्कृतिक पहुंच का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है।
जून 2025 में 11वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर 191 देशों में लगभग 2,000 कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
इस बीच, ओसाका, जापान में ‘वर्ल्ड एक्सपो 2025’ में दैनिक योग सत्रों ने भारतीय मंडप को इस आयोजन के सबसे अधिक देखे जाने वाले प्रमुख आकर्षणों में से एक बना दिया।
भारत प्रमुख अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा को शामिल करने का काम जारी रखे हुए है।
हाल ही में हुए ब्रिक्स बयानों, जिनमें रियो डी जनेरियो घोषणापत्र भी शामिल है, के बाद चंडीगढ़ में हुई 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पर एक समर्पित विशेषज्ञ कार्य समूह की स्थापना की गई।
साथ ही, सरकार विदेशी मरीज़ों के लिए भारत में प्राकृतिक चिकित्सा लेना आसान बना रही है। खास आयुष वीज़ा विकल्प अब यात्रा को आसान बनाते हैं; इनमें मरीज़ों के लिए एम -3 वीज़ा और उनके साथ आने वाले देखभाल करने वालों के लिए एम -4 वीज़ा की सुविधा है।
यह पहल भारत के वैश्विक चिकित्सा पर्यटन केंद्र बनने के लक्ष्य को बढ़ावा देती है।आयुष क्षेत्र के लिए
केंद्रीय बजट (2026-27) में आयुष मंत्रालय के लिए 4,408 करोड़ रुपये का आवंटन देशभर में आयुष स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, साक्ष्य-आधारित अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने और आयुष से जुडी अन्य अवसंरचना व वैश्विक पहुंच को मज़बूत करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है। बजट में कई प्रमुख पहलों की घोषणा की गई:
शिक्षा, नैदानिक सेवाओं और अनुसंधान को सुदृढ़ करने के लिए तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों (एआईआईए) की स्थापना।
गुणवत्ता, मानकीकरण और कुशल जनशक्ति की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आयुष फार्मेसियों और औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं का उन्नयन।
पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में साक्ष्य-आधारित अनुसंधान और वैश्विक स्तर पर पहुँच को बढ़ावा देने के लिए जामनगर स्थित डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र का उन्नयन।
आयुर्वेद का सफ़र विरासत में मिली ज्ञान-परंपरा से लेकर आज की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के एक व्यवस्थित और संस्थागत हिस्से के तौर पर विकसित होने तक का रहा है, जो आधुनिक समाज में इसकी बढ़ती अहमियत को दिखाता है।
स्वास्थ्य सेवा की अवसंरचना शिक्षा, अनुसंधान, नियामक तंत्र, डिजिटल पहुँच और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विस्तार ने इसके विकास और जिम्मेदार एकीकरण के लिए एक व्यापक इकोसिस्टम तैयार किया है।
वैज्ञानिक मान्यता, गुणवत्ता के मानकों और साक्ष्य-आधारित अनुसंधान पर बढ़ता ज़ोर, इसकी समकालीन प्रासंगिकता को सुदृढ़ करने में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में आयुर्वेद को शामिल करने और इसके विस्तार पाते वैश्विक गठबंधन यह दर्शाते हैं कि पारंपरिक ज्ञान किस प्रकार आधुनिक संस्थानों और वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जुड़ सकता है।
इस प्रकार, आयुर्वेद का निरंतर विकास भारत के सभ्यतागत ज्ञान, समकालीन स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और समग्र कल्याण के प्रयास के बीच एक गतिशील तालमेल को दर्शाता है।
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