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वन्दे मातरम् पर संग्राम: क्या मोहम्मद अली जिन्ना के पदचिन्हो पर है कांग्रेस ?

‘वन्दे मातरम्’ पर गहराया सियासी संग्राम: 1937 के फैसले से लेकर 2026 के नए कानून तक, जानें इस राष्ट्रीय प्रतीक पर क्यों हो रही है राजनीति?

 नई दिल्ली : संतोष सेठ की रिपोर्ट :THE POLITICS AGAIN

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में असंख्य देशभक्तों के भीतर ऊर्जा भरने वाला राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ एक बार फिर राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ गया है।

जिस गीत की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने केवल मातृभूमि की वंदना के लिए की थी, उसे आज राजनीतिक दल अपने-अपने चुनावी चश्मे से देख रहे हैं।

इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को भी ‘वोट बैंक’ की राजनीति का हिस्सा बना दिया गया है?

विवाद की जड़: 1937 का वह कांग्रेस अधिवेशन

मौजूदा बहस का एक बड़ा हिस्सा इतिहास के पन्नों से जुड़ा है। वन्दे मातरम् के अंतिम दो भागों का पहली बार विरोध मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने किया था।

उस समय की सांप्रदायिक और जटिल राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए, 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने सार्वजनिक अवसरों पर गीत के केवल पहले दो पदों (Stanzas) के गायन की व्यवस्था बनाई थी।

आज कांग्रेस का एक धड़ा उसी 1937 की परंपरा का हवाला दे रहा है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि 1937 का गुलाम भारत और आज का संप्रभु, स्वतंत्र भारत एक समान नहीं हैं।

आज की परिस्थितियां बदल चुकी हैं, इसलिए 90 साल पुराने फैसलों को वर्तमान की ढाल नहीं बनाया जा सकता।

संविधान में दर्जा और 2026 का नया सख्त कानून

स्वतंत्र भारत में इस गीत का एक गौरवशाली संवैधानिक इतिहास रहा है:

  • संवैधानिक सम्मान: 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वन्दे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान ही सम्मान और ‘राष्ट्रीय गीत’ का दर्जा दिया था।

  • नए दिशा-निर्देश और कानून: केंद्र सरकार ने हाल ही में इसके पूर्ण संस्करण (छह अंतरे) को सार्वजनिक प्रसारण में बढ़ावा दिया है।

  • इसके अलावा, जुलाई 2026 में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून’ में संशोधन का प्रस्ताव भी लाया गया है।

  • इसके तहत अब राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिकरण: कांग्रेस बनाम भाजपा और हिन्दू बनाम मुस्लिम

राजनीतिक गलियारों में यह बहस ‘कांग्रेस बनाम भाजपा’ की शक्ल ले चुकी है। यह सच है कि 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था।

ऐसे में यह कहना कि वन्दे मातरम् केवल भाजपा की विचारधारा है, इतिहास के साथ अन्याय होगा। भाजपा स्वतंत्रता के बाद बनी, जबकि यह गीत उससे काफी पहले भारत की राष्ट्रचेतना का प्रतीक बन चुका था।

संवाद की जरूरत, विवाद की नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि वन्दे मातरम् को राजनीति के अखाड़े से निकालकर राष्ट्रचेतना के केंद्र में स्थापित करने की आवश्यकता है।

इसे ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ विवाद में बदलना इसके ऐतिहासिक स्वरूप को छोटा करना है। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, लेकिन मातृभूमि के प्रति सम्मान का भाव सभी का साझा होना चाहिए।

राष्ट्रगीत का सम्मान किसी कानून से थोपा नहीं जा सकता, बल्कि इसके इतिहास और महत्व को जानकर नई पीढ़ी में स्वाभाविक रूप से यह श्रद्धा विकसित की जानी चाहिए।

Santosh SETH

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