The majestic building of Allahabad High Court with a gavel, representing the strict order against the misuse of SC/ST Act relief funds

इलाहाबाद हाईकोर्ट: SC/ST एक्ट के मुआवजे के दुरुपयोग पर जांच का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘SC/ST एक्ट के मुआवजे का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं’, एक ही परिवार को 23 लाख बंटाने पर दिए जांच के आदेश”

प्रयागराज : संतोष सेठ की रिपोर्ट : THE POLITICS AGAIN

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST एक्ट के तहत पीड़ितों के पुनर्वास के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता (मुआवजे) के संभावित दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने झांसी से जुड़ी आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि सरकारी खजाने से अनुचित लाभ लेने के लिए इस जनहितकारी और संवेदनशील योजना का दुरुपयोग किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अदालत ने पूरे राज्य में इस व्यवस्था की सख्त निगरानी और समीक्षा का आदेश दिया है।

एक ही परिवार को 23.36 लाख, कोर्ट ने जताई हैरानी

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों ने अदालत को भी चौंका दिया।

  • कोर्ट को अवगत कराया गया कि झांसी निवासी संतोष कुमार धोहरे और उसके परिवार को विभिन्न आपराधिक मामलों में पीड़ित बताकर अब तक 23.36 लाख रुपये की राहत राशि बांटी जा चुकी है।

  • इतना ही नहीं, इस परिवार से जुड़े 10 से 12 अन्य मामले भी राहत राशि के लिए जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं।

  • हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे जनहितकारी योजना के बड़े दुरुपयोग और फर्जीवाड़े की आशंका माना है।

झांसी DM और SSP को 3 महीने में जांच के आदेश

इस चौंकाने वाले मामले का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को सख्त निर्देश दिए हैं।

  • अदालत ने कहा है कि इस मामले में अब तक वितरित की गई राहत राशि की तीन महीने के भीतर निष्पक्ष और विस्तृत जांच कराई जाए।

  • यदि जांच में कोई फर्जीवाड़ा या गड़बड़ी पाई जाती है, तो झूठे मुकदमे दर्ज कर फंड हड़पने वाले व्यक्तियों के साथ-साथ इसमें मिलीभगत करने वाले दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की जाए।

‘वास्तविक पीड़ितों का हक न मारा जाए’

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि SC/ST एक्ट के तहत आर्थिक सहायता का मूल उद्देश्य वास्तविक पीड़ित व्यक्तियों का पुनर्वास और उन्हें न्याय दिलाना है।

राज्य के सभी जिलों में स्थित विशेष न्यायाधीशों (SC/ST एक्ट) और प्रशासनिक अधिकारियों को यह सख्त हिदायत दी गई है कि वे बार-बार एक ही तरह के मामले दर्ज कराकर फंड हड़पने वाले तत्वों (Repeat Offenders) पर पैनी नजर रखें,

ताकि वास्तविक पीड़ितों का अधिकार सुरक्षित रहे और किसी भी पात्र व्यक्ति का दावा प्रभावित न हो।

पूरे प्रदेश के लिए जारी हुआ फरमान

यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस आदेश का पालन पूरे उत्तर प्रदेश में हो, हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है।

अदालत ने कहा है कि इस आदेश की प्रति 10 दिनों के भीतर यूपी के सभी जिलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिलाधिकारी, एसएसपी/एसपी, पुलिस आयुक्त, मुख्य सचिव, गृह सचिव और कानून/न्याय विभाग के प्रमुख सचिव को अनिवार्य रूप से भेजी जाए।