सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गाजियाबाद के हरीश को 12 साल बाद मिली इच्छामृत्यु | The Politics Again
“सुप्रीम कोर्ट की UCC पर अहम टिप्पणी: ‘अब विचार करने का समय आ गया है’, लेकिन शरियत कानून पर फैसले का अधिकार संसद को “
नई दिल्ली (The Politics Again): संतोष सेठ की रिपोर्ट
समान नागरिक संहिता (UCC) और मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि देश में अब समान नागरिक संहिता (UCC) पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट की धाराओं को रद्द करने जैसे संवेदनशील मामलों पर अंतिम फैसला लेना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि विधायिका (संसद) का अधिकार क्षेत्र है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ कर रही थी, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन भी शामिल थे।
पीठ 1937 के शरियत कानून की उन धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों के प्रति भेदभावपूर्ण बताया गया है।
कानूनी शून्यता (Legal Vacuum) का खतरा
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से कई अहम सवाल पूछे। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा:
यदि न्यायालय शरियत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देता है, तो इससे एक ‘कानूनी शून्यता’ (Legal Vacuum) पैदा हो सकती है, क्योंकि वर्तमान में मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है।
अदालत ने कहा कि सुधार की जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम उठाना उचित नहीं होगा जिससे महिलाओं को वर्तमान में मिल रहे अधिकारों से भी वंचित होना पड़े।
‘संसद के लिए निर्णय लेना अधिक उपयुक्त’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी अपनी राय रखते हुए कहा कि यद्यपि याचिका में भेदभाव का मुद्दा काफी मजबूत है, लेकिन इस विषय पर निर्णय लेना संसद के लिए अधिक उपयुक्त होगा।
संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles) के तहत समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का दायित्व विधायिका को ही सौंपा गया है।
अदालत ने याद दिलाया कि न्यायालय पहले भी कई बार संसद से UCC लागू करने पर विचार करने की सिफारिश कर चुका है।
सामाजिक और व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार के लिए विधायी प्रक्रिया (संसद के जरिए कानून बनाना) ही सबसे सही रास्ता है।
प्रशांत भूषण की दलील: ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम हो लागू’
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अदालत को कम से कम यह घोषणा करनी चाहिए कि मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति में पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार का अधिकार मिलना चाहिए।
उनका तर्क था कि यदि शरियत कानून की विवादित धाराएं हटा दी जाती हैं, तो ऐसे मामलों में ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम’ (Indian Succession Act) को लागू किया जा सकता है।
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