1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना की वर्दी में दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर, जिन्होंने देश सेवा के लिए अपना सिनेमाई करियर दांव पर लगा दिया था।
सिनेमा से सीमा तक: नाना पाटेकर ने कारगिल युद्ध में 60 दिन गुजारे थे LOC पर, देश के लिए दांव पर लगा दिया था करियर”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
75 वर्ष की उम्र में दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन (मृत्यु: 8 अक्टूबर 2026, गोवा) से पूरा देश शोक में है।
एक तरफ जहां सिनेमा जगत उनके दमदार अभिनय (परिंदा, क्रांतिवीर, तिरंगा) को याद कर रहा है, वहीं देशवासी उनके उस अदम्य साहस को नमन कर रहे हैं, जब उन्होंने पर्दे का ‘मेजर प्रताप चौहान’ (फिल्म प्रहार-1991) बनकर नहीं, बल्कि असली जिंदगी में एक फौजी बनकर कारगिल युद्ध (1999) में भारत माता की सेवा की थी।
बहुत कम लोग जानते हैं कि नाना पाटेकर भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army) के सम्मानित अधिकारी रहे हैं और उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे (Frontline) पर पूरे 60 दिन बिताए थे।
1991 में रिलीज हुई फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के निर्देशन और उसमें मेजर प्रताप चौहान की भूमिका निभाने के लिए नाना पाटेकर ने पुणे में मराठा लाइट इन्फैंट्री (Maratha Light Infantry) के साथ कठोर सैन्य प्रशिक्षण लिया था।
इसी दौरान उनका सेना के प्रति गहरा लगाव हो गया था, जिसके बाद उन्हें भारतीय प्रादेशिक सेना में मानद रैंक से सम्मानित किया गया था।
1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा, तब नाना पाटेकर अपने अभिनय करियर के चरम पर थे और तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके थे।
लेकिन उन्होंने अपने स्टारडम को दरकिनार करते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से सेना के साथ सीमा पर जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के तुरंत बाद वे फिल्मों की शूटिंग छोड़कर युद्ध क्षेत्र में पहुंच गए।
युद्ध के दौरान नाना पाटेकर कोई वीआईपी अतिथि नहीं, बल्कि सेना की ‘क्विक रिएक्शन टीम’ (QRT) के सक्रिय सदस्य के रूप में वहां रहे।
एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था, “मैं क्विक रिएक्शन टीम का हिस्सा बन गया था, जो सेना की सबसे विशिष्ट ताकतों में से एक है। हमारा सबसे बड़ा हथियार बोफोर्स या एके-47 नहीं, बल्कि हमारे जवान हैं।”
उन्होंने द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला, सोपोर और मुगलपुरा जैसे बेहद संवेदनशील इलाकों और नियंत्रण रेखा (LOC) पर जवानों के साथ गश्त लगाई। इसके अलावा, उन्होंने अस्पताल बेस में घायल जवानों की मदद भी की।
कारगिल के उस खौफनाक और सर्द माहौल ने नाना को शारीरिक और मानसिक रूप से गहराई तक प्रभावित किया।
उन्होंने बताया था, “जब मैं श्रीनगर पहुंचा था, तब मेरा वजन 76 किलो था। 60 दिन बाद जब मैं वापस लौटा, तो मेरा वजन घटकर सिर्फ 56 किलो रह गया था।”
62 वर्ष की आयु में वे भारतीय सेना से मानद कैप्टन (Honorary Captain) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
नाना पाटेकर का यह सफर साबित करता है कि वे केवल रील लाइफ के नहीं, बल्कि रियल लाइफ के भी सच्चे हीरो थे।
| विवरण / पहलू | महत्वपूर्ण जानकारी |
| सेना में भूमिका | भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army) में मानद रैंक। |
| कारगिल में बिताया समय | लगभग 60 दिन (1999 के युद्ध के दौरान)। |
| टीम का हिस्सा | क्विक रिएक्शन टीम (QRT – Quick Reaction Team)। |
| तैनाती के इलाके | द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला, सोपोर और मुगलपुरा। |
| मुख्य कार्य | LOC पर गश्त लगाना और बेस अस्पताल में घायल जवानों की मदद। |
| शारीरिक प्रभाव | युद्ध के दौरान वजन 76 किलो से घटकर 56 किलो (20 किलो कम) हो गया। |
| प्रेरणा स्रोत | 1991 की फिल्म ‘प्रहार’ के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री में ली गई ट्रेनिंग। |
| रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) | 62 वर्ष की आयु में मानद कैप्टन (Honorary Captain) के पद से। |
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