जूनागढ़ रियासत को भारत में मिलाने वाले 'लौह पुरुष' सरदार पटेल। 'आरजी हुकूमत' के विद्रोह के आगे पाकिस्तान भागा था नवाब। (ग्राफिक्स: द पॉलिटिक्स अगेन)
जूनागढ़ का ऐतिहासिक विलय: जब सरदार पटेल के ‘लौह इरादों’ और ‘आरजी हुकूमत’ के आगे पस्त हो गए थे नवाब के मंसूबे”
The Politics Again डेस्क: संतोष सेठ
31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती (राष्ट्रीय एकता दिवस) मनाई जाती है। सरदार पटेल ने 562 देशी रियासतों का एकीकरण कर एक ‘अखंड भारत’ का निर्माण किया था।
लेकिन इस एकीकरण की सबसे दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण कहानियों में से एक गुजरात की ‘जूनागढ़ रियासत’ का विलय है।
जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था, लेकिन सरदार पटेल की कूटनीति और जनता की ‘आरजी हुकूमत’ (अस्थायी सरकार) ने नवाब के मंसूबों को हमेशा के लिए दफन कर दिया। आइए जानते हैं इतिहास का यह गौरवशाली अध्याय।
आजादी के समय जूनागढ़ की 80% से ज्यादा आबादी हिंदू थी, लेकिन वहां का शासक नवाब महाबत खान तृतीय (Nawab Mahabat Khan III) था।
नवाब को कुत्तों से बेहद लगाव था और प्रशासन की कोई फिक्र नहीं थी। उसके दीवान सर शाहनवाज भुट्टो (जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) के उकसावे पर नवाब ने 15 अगस्त 1947 को जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में करने की घोषणा कर दी।
जिन्ना ने भी तुरंत इस विलय को स्वीकार कर लिया, जिससे भारत सरकार और जूनागढ़ की जनता में भारी आक्रोश फैल गया।
जूनागढ़ के नवाब के इस फैसले के खिलाफ वहां की जनता ने बगावत कर दी। जूनागढ़ के नागरिकों और देशभक्तों ने 25 सितंबर 1947 को बंबई (अब मुंबई) के माधवबाग में एक विशाल जनसभा की और एक समानांतर सरकार ‘आरजी हुकूमत’ (Aarzi Hukumat) का गठन किया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भतीजे शामलदास गांधी (Samaldas Gandhi) को इस ‘आरजी हुकूमत’ का अध्यक्ष चुना गया।
इस हुकूमत ने अपनी एक ‘आजाद फौज’ भी बनाई, जिसका काम जूनागढ़ को नवाब के चंगुल से मुक्त कराना था।
सरदार पटेल स्पष्ट कर चुके थे कि जूनागढ़ भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से भारत का हिस्सा है। उन्होंने द्विआयामी रणनीति (Two-pronged strategy) अपनाई:
आर्थिक नाकेबंदी: सरदार पटेल ने जूनागढ़ की आर्थिक नाकेबंदी कर दी। वहां कोयला, पेट्रोल और राशन की सप्लाई रोक दी गई, जिससे रियासत का प्रशासन चरमरा गया।
आरजी हुकूमत को खुला समर्थन: भारतीय सेना को जूनागढ़ की सीमाओं पर तैनात कर दिया गया,
लेकिन सीधे हमले के बजाय आरजी हुकूमत की फौज को आगे किया गया। आरजी हुकूमत ने एक-एक करके जूनागढ़ के कई गांवों और कस्बों पर कब्जा कर लिया।
आरजी हुकूमत की फौज जब जूनागढ़ की राजधानी की तरफ बढ़ने लगी और भारतीय सेना ने भी सीमाएं सील कर दीं, तो नवाब महाबत खान बुरी तरह घबरा गया।
वह अक्टूबर 1947 के अंत में अपने परिवार, अपने पसंदीदा कुत्तों और रियासत का सारा खजाना लेकर एक विशेष विमान से कराची (पाकिस्तान) भाग गया।
नवाब के भागने के बाद जूनागढ़ में पूरी तरह से अराजकता फैल गई। हार मान चुके दीवान शाहनवाज भुट्टो ने 8 नवंबर 1947 को भारत सरकार को पत्र लिखकर जूनागढ़ का प्रशासन संभालने का अनुरोध किया।
9 नवंबर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ में प्रवेश किया और उसे अपने नियंत्रण में ले लिया।
बाद में, सरदार पटेल के निर्देश पर 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ में एक जनमत संग्रह (Plebiscite) कराया गया।
कुल 2,01,457 मतदाताओं में से सिर्फ 91 लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया, जबकि 99% से ज्यादा जनता ने भारत के साथ रहने का फैसला किया।
| विषय (Topics) | ऐतिहासिक तथ्य (Historical Facts) |
| जूनागढ़ का नवाब | महाबत खान तृतीय (पाकिस्तान जाने की घोषणा की) |
| विवाद का कारण | शासक मुस्लिम था, जबकि 80% से अधिक जनता हिंदू थी और सीमाएं भारत से सटी थीं। |
| ‘आरजी हुकूमत’ का गठन | 25 सितंबर 1947 (बंबई के माधवबाग में) |
| आरजी हुकूमत के अध्यक्ष | शामलदास गांधी (महात्मा गांधी के भतीजे) |
| सरदार पटेल की रणनीति | आर्थिक नाकेबंदी, सैन्य तैनाती और ‘आरजी हुकूमत’ का समर्थन |
| भारत का जूनागढ़ पर नियंत्रण | 9 नवंबर 1947 (नवाब के कराची भागने के बाद) |
| जनमत संग्रह (Plebiscite) | 20 फरवरी 1948 (99% से ज्यादा वोट भारत के पक्ष में) |
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