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जौनपुर : मुस्लिम परिवार ने कार्ड पर लिखा ‘दूबे’, पूर्वजों की पहचान पर गर्व

“उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक मुस्लिम परिवार द्वारा अपनी सांस्कृतिक और जातीय जड़ों को पुनर्जीवित करने का एक अनूठा प्रयास सुर्खियों में है”

जौनपुर 14 / 12 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट 

जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर डेहरी गांव के निवासी नौशाद अहमद ने अपने बेटे खालिद की शादी के निमंत्रण कार्ड पर अपना हिंदू सरनेम ‘दूबे’ लगाया है, और दावत-ए-वलीमा को ‘बहुभोज’ का नाम दिया है। यह शादी आज (14 दिसंबर) को हो रही है।

नौशाद अहमद दूबे का यह कदम केवल एक टाइटल बदलने से कहीं अधिक है; यह भारत में सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और जड़ों की पहचान का एक सशक्त संदेश है।

📜 ‘दूबे’ सरनेम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नौशाद अहमद दूबे ने मीडिया को अपनी पीढ़ियों के इतिहास के बारे में बताया। उनका दावा है कि उनके पूर्वज श्री लालबहादुर दुबे थे, जो 1669 ई. के जमींदार थे।

बाद में, लालबहादुर दुबे लाल मोहम्मद शेख बन गए, लेकिन नौशाद का दृढ़ मत है कि पूर्वजों ने धर्म बदला, जाति नहीं, और जो चीज बदली नहीं जा सकती, उसे जबरन क्यों बदला जाए।

“हमारे पूर्वज लाल बहादुर दुबे थे। इस तरह से हमारी जाति वही हुई। हमारे पूर्वजों ने धर्म बदला, जाति नहीं, क्योंकि जाति तो बदली नहीं जा सकती। जो चीज बदली नहीं जा सकती। उसे हम लोग जबरन क्यों बदलेंगे?” – नौशाद अहमद दूबे

नौशाद खुद को ब्राह्मण परिवार से मानते हैं और अपनी जड़ों की पुष्टि के लिए आजमगढ़ से लेकर कई जगहों पर 150 साल पुराने कागज भी तलाश रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि परिवार के सारे लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे ब्राह्मण परिवार से हैं।

🕊️ नफरत खत्म करने का माध्यम: ‘गुड मिक्स प्रथा’

नौशाद अहमद दूबे, जो सामाजिक संगठन विशाल भारत संस्थान के जिला चेयरमैन भी हैं, इस पहल को ‘गुड मिक्स प्रथा’ का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य देश में फैली नफरत को खत्म करना है।

उनके अनुसार, जब लोगों को पता चलता है कि ये परिवार कभी उनके ही परिवार का हिस्सा था, तो इससे भाईचारा बना रहता है। वह सक्रिय रूप से ‘मुस्लिम ब्राह्मणों’ की खोज कर रहे हैं ताकि उन्हें समझाया जा सके कि उनकी जड़ें अरबी या तुर्की से नहीं, बल्कि भारतीयता से जुड़ी हैं।

🤵 विवाह की तैयारियां और आमंत्रण

नौशाद के बेटे खालिद, जो सऊदी अरब में कपड़ों का कारोबार करते हैं, की शादी आजमगढ़ के असाऊ गांव से हो रही है। शादी के कार्ड पर स्पष्ट रूप से लिखा है: ‘श्री लालबहादुर दुबे 1669 ई. के जमींदार के आठवीं पीढ़ी के वंशज खालिद ‘दूबे’ की शादी एवं बहुभोज (दावत-ए-वलीमा) के शुभ अवसर पर आप सभी आमंत्रित हैं।’

  • विरोध और समर्थन: नौशाद ने स्वीकार किया कि टाइटल बदलने के कारण उन्हें अपनी ही कौम के लोगों का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन सरकारी कामकाज में कोई बाधा नहीं आई। उन्होंने आधार कार्ड और खतौनी में भी ‘नौशाद अहमद दूबे’ दर्ज कराने का प्रयास कर रहे हैं।

  • शादी में निमंत्रण: बहुभोज (दावत-ए-वलीमा) में हिंदू ब्राह्मण, मुस्लिम ब्राह्मण, सामाजिक संगठन के सदस्य और अन्य मिलाकर लगभग 2000 लोगों को आमंत्रित किया गया है।

  • वीवीआईपी निमंत्रण: नौशाद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी निमंत्रण भेजा है।

📜 ‘दूबे’ सरनेम की अनूठी कहानी

नौशाद अहमद दूबे ने बताया कि यह टाइटल उन्होंने जानबूझकर अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए लगाया है।

  • पूर्वज: नौशाद के अनुसार, उनके पूर्वज श्री लालबहादुर दुबे थे, जो 1669 ई. के जमींदार थे और बाद में लाल मोहम्मद शेख हो गए थे।

  • जाति नहीं बदली: उनका तर्क है कि उनके पूर्वजों ने धर्म बदला, लेकिन जाति नहीं बदली, क्योंकि जाति बदली नहीं जा सकती।

  • पहचान की तलाश: उन्होंने बताया कि वह 150 साल पुराने कागजात तलाश रहे हैं ताकि यह पता चल सके कि किन परिस्थितियों में उनकी पीढ़ियों ने यह टाइटल छोड़ा था।

  • ब्राह्मण परिवार से जुड़ाव: नौशाद ‘दूबे’ खुद को ब्राह्मण परिवार से मानते हैं और ‘मुस्लिम ब्राह्मणों’ की खोज कर रहे हैं, ताकि उन्हें समझाया जा सके कि उनकी जड़ें अरबी या तुर्की से नहीं, बल्कि भारतीयता से जुड़ी हैं।

  • बेटे की शादी: उनके बेटे खालिद ‘दूबे’ (जो सऊदी अरब में कपड़ों का कारोबार करते हैं) की शादी आज आजमगढ़ जिले से हो रही है।

🤝 सद्भाव और भाईचारे का प्रयास

नौशाद ‘दूबे’ विशाल भारत संस्थान नाम का एक सामाजिक संगठन भी चलाते हैं और इस पहल को ‘गुड मिक्स प्रथा’ बताते हैं।

  • उद्देश्य: उनका उद्देश्य है कि जब लोगों को पता चलता है कि वे कभी एक ही परिवार का हिस्सा थे, तो देश में फैली नफरत खत्म हो और भाईचारा बना रहे।

  • विरोध का सामना: नौशाद ने स्वीकार किया कि उन्हें अपनी कौम के लोगों का विरोध झेलना पड़ा है, लेकिन सरकारी काम में कोई दिक्कत नहीं आई है।

  • आमंत्रण: शादी में 2000 लोगों को आमंत्रित किया गया है, जिसमें हिंदू ब्राह्मण, मुस्लिम ब्राह्मण और सामाजिक संगठनों के लोग शामिल हैं।

  • मान्यता: नौशाद का मानना है कि ‘बहुभोज’ और ‘दावत-ए-वलीमा’ में केवल भाषा का अंतर है।

नौशाद दूबे ने स्पष्ट किया कि उन्होंने लड़की के परिवार से कोई बात नहीं छिपाई है और उन्हें भी इस टाइटल से कोई एतराज नहीं है, क्योंकि उनका लक्ष्य भाषा के अंतर से पैदा हुई नफरत को खत्म करना है।

Santosh SETH

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