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जन विश्वास बिल 2026: जनता को मिलेगी राहत, छोटे अपराधों पर जेल नहीं

जन विश्वास बिल 2026: स्वास्थ्य और फार्मा सेक्टर को बड़ी राहत, छोटे उल्लंघनों में अब जेल नहीं, सिर्फ जुर्माना 

नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट 

देश में ‘व्यापार करने में सुगमता’ (Ease of Doing Business) और ‘जीवन यापन में सुगमता’ (Ease of Living) को बढ़ावा देने के लिए संसद के दोनों सदनों से ‘जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित हो गया है।

सरकार की विश्वास-आधारित शासन व्यवस्था को दर्शाने वाला यह बिल विशेष रूप से स्वास्थ्य, फार्मेसी और कॉस्मेटिक क्षेत्र से जुड़े कारोबारियों और पेशेवरों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।

79 कानूनों के 784 प्रावधानों में महा-बदलाव

इस ऐतिहासिक विधेयक के माध्यम से 23 विभिन्न मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधानों में बड़े संशोधन किए गए हैं।

इनमें से 717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर (Decriminalize) कर दिया गया है, जबकि 67 प्रावधानों को जीवन यापन सुगम बनाने के लिए बदला गया है। कुल मिलाकर 1,000 से अधिक छोटे अपराधों को तर्कसंगत बनाया गया है।

स्वास्थ्य क्षेत्र (Health Sector) में क्या बदला?

सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुरक्षा मानकों से समझौता किए बिना अनुपालन के बोझ को कम करने के लिए 5 प्रमुख स्वास्थ्य कानूनों में बड़े बदलाव किए गए हैं:

  1. औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 (Drugs & Cosmetics Act)

  2. फार्मेसी अधिनियम, 1948

  3. खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 (FSSAI)

  4. नैदानिक ​​प्रतिष्ठान (पंजीकरण एवं विनियमन) अधिनियम, 2010 (Clinical Establishments Act)

  5. राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य सेवा व्यवसाय आयोग अधिनियम, 2021

जेल की सजा खत्म, अब लगेगा मौद्रिक दंड (Civil Penalty)

इन सुधारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब मामूली प्रक्रियात्मक उल्लंघनों (जैसे दस्तावेजों का रखरखाव न करना या जानकारी समय पर न देना) के लिए आपराधिक मुकदमे और कारावास (जेल) की सजा नहीं होगी।

इसके स्थान पर अब नागरिक/आर्थिक दंड (Monetary Penalty) लगाया जाएगा। हालांकि, नकली दवा या जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले गंभीर मामलों में सख्त सजा का प्रावधान बरकरार रखा गया है।

अदालतों का बोझ होगा कम

सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics) उद्योग और क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट के मामले में, जहां मरीजों की सुरक्षा को तत्काल खतरा नहीं है, वहां मामलों को अदालत ले जाने के बजाय सरकार द्वारा नियुक्त ‘न्यायनिर्णय प्राधिकारियों’ (Adjudicating Authorities) के माध्यम से निपटाया जाएगा।

इससे अदालतों पर मुकदमों का बोझ घटेगा, व्यवसायियों को अनावश्यक मानसिक उत्पीड़न से मुक्ति मिलेगी और पारदर्शी तरीके से सुधार के मौके मिलेंगे।

Santosh SETH

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