भारत में 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान के तहत ईको-फ्रेंडली त्योहारों की शानदार पहल; आस्था, परंपरा और प्रकृति के संरक्षण का अनूठा संगम।
भारत में ईको-फ्रेंडली त्योहारों की बढ़ती लहर: ‘स्वच्छता ही सेवा’ ने बदली तस्वीर, आस्था और पर्यावरण का अनूठा संगम”
नई दिल्ली: द पॉलिटिक्स अगेन : संतोष सेठ की रिपोर्ट
भारत में त्योहारों का मतलब है अपार खुशी, गहरी आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का जश्न। लेकिन अब इन उत्सवों के साथ पर्यावरण संरक्षण का एक नया और सकारात्मक अध्याय भी जुड़ गया है।
‘स्वच्छता ही सेवा 2026’ अभियान के तहत देश भर में पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) त्योहार मनाने की जागरूकता तेजी से बढ़ रही है।
लोग अब अपनी आस्था और परंपराओं से समझौता किए बिना प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी संवेदनशीलता के साथ निभा रहे हैं।
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन चढ़ने वाले 5-6 टन फूलों का अब बेहतरीन सदुपयोग हो रहा है।
‘शिव अर्पण स्वयं सहायता समूह’ की महिलाएं इन अर्पित फूलों को जैविक खाद, बायो-ब्रिकेट्स और अगरबत्तियों में तब्दील कर रही हैं।
यह पहल न केवल कचरा प्रबंधन का शानदार उदाहरण बन गई है, बल्कि इससे महिलाओं को स्थायी रोजगार भी मिल रहा है। आस्था के फूल अब आजीविका का साधन बन गए हैं।
प्रकृति को बचाने के लिए गणेश उत्सव में भी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए नवी मुंबई में 136 कृत्रिम तालाब बनाए गए।
बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) ने मूर्तिकारों को 500 टन मुफ्त शाडू माटी बांटी और ‘इको-बप्पा’ ऐप के जरिए पर्यावरण संरक्षण की जागरूकता फैलाई।
नवाचार की बात करें तो, दिल्ली में नारियल की छाल और बीज युक्त मिट्टी से ऐसी मूर्तियां बनाई गईं, जो विसर्जन के बाद पौधों में बदल गईं।
वहीं, विसर्जन के बाद वर्सोवा बीच पर स्वयंसेवकों द्वारा सफाई अभियान चलाकर 7400 पीओपी (POP) मूर्तियों को निकालना जन-भागीदारी की एक बड़ी मिसाल है।
दुर्गा पूजा में भी अब संवहनीयता (Sustainability) की झलक साफ दिख रही है। पंडालों के निर्माण में प्रदूषण फैलाने वाले प्लास्टिक और थर्मोकोल की जगह बांस, जूट, सूखी घास और लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है।
सबसे बड़ा बदलाव प्रसाद वितरण में दिखा है, जहां प्लास्टिक की प्लेटों की बजाय कागज की प्लेटें, केले के पत्ते, दोने-पत्तल और मिट्टी के कुल्हड़ का उपयोग प्रकृति के प्रति समाज की बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाता है।
‘स्वच्छ दिवाली, शुभ दिवाली’ अभियान के तहत घरों की सफाई में निकलने वाले कबाड़ को 3R (Reduce, Reuse, Recycle) केंद्रों तक पहुंचाया जा रहा है।
दिल्ली में गिफ्ट स्वैप (उपहारों के पुनः उपयोग) और बेकार गत्तों व आइसक्रीम स्टिक से सजावट की चीजें बनाने जैसी शानदार पहल की गई।
वहीं, देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दिवाली के तुरंत बाद सुबह 4 बजे से ही विशेष सफाई अभियान शुरू होना पूरे देश के लिए एक आदर्श व्यवस्था बन गया है।
नदियों और प्रकृति की उपासना के महापर्व छठ पर पटना जैसे शहरों में घाटों पर ‘जीरो-वेस्ट’ नीति लागू की गई है।
यहां घाटों पर प्लास्टिक को सख्ती से बैन किया गया है। गीले कचरे को तुरंत खाद में बदलने की व्यवस्था और व्यापक जन-जागरूकता (IEC) अभियानों के जरिए घाटों की पवित्रता और स्वच्छता को बरकरार रखा जा रहा है।
ये सभी प्रयास हमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख देते हैं कि एक उत्सव वास्तव में तभी पूर्ण होता है जब उसकी खुशी तो लोगों के दिलों में बनी रहे, लेकिन उसका बोझ हमारी धरती पर न पड़े।
त्योहारों की रौनक, दीयों की चमक और प्रार्थनाओं की गूंज अनवरत बनी रहनी चाहिए, बस हमें उत्सव मनाने के उन संवहनीय तरीकों को अपनाना है जो हमारी प्रकृति का भी पूरा ख्याल रखें।
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