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राजनीति में AI और डीपफेक का डर्टी गेम लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा !

राजनीति का नया ‘डर्टी गेम’; क्या AI जनरेटेड वीडियो और ऑडियो बनेंगे चुनावों के असली ‘गेम चेंजर’? 

विशेष सम्पादकीय विश्लेषण (The Politics Again): संतोष सेठ की रिपोर्ट 

चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद… ये राजनीति के सदियों पुराने हथियार रहे हैं। लेकिन 21वीं सदी के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ ने एक नया, अदृश्य और बेहद खतरनाक रूप ले लिया है।

यह रूप है- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक (Deepfake) तकनीक का। अब चुनाव मैदान में नहीं, बल्कि आईटी सेल के बंद कमरों में ‘कोड’ और ‘एल्गोरिदम’ के जरिए लड़े और जीते जा रहे हैं।

क्या सच में AI जनरेटेड वीडियो और ऑडियो अब चुनावों के असली ‘गेम चेंजर’ बन चुके हैं? पश्चिम बंगाल का हालिया घटनाक्रम इसी खतरे की एक डरावनी घंटी है।

हुमायूं कबीर का मामला: जब एक वीडियो ने बदल दी चुनावी हवा

पश्चिम बंगाल चुनाव की वोटिंग से ठीक पहले ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ के हुमायूं कबीर का एक वीडियो वायरल हुआ।

इस वीडियो में 1000 करोड़ की डील, 200 करोड़ का एडवांस और उपमुख्यमंत्री पद के वादे की बात सुनाई दी। इस एक वीडियो ने रातों-रात सियासत में भूचाल ला दिया।

टीएमसी ने आक्रामक होकर ईडी जांच की मांग कर दी, और दूसरी तरफ असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने कबीर से अपना गठबंधन ही तोड़ लिया।

हुमायूं कबीर चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह वीडियो ‘AI जनरेटेड’ और डीपफेक है। सच क्या है, यह पुलिस और फॉरेंसिक जांच के बाद सामने आएगा, लेकिन राजनीतिक ‘डैमेज’ तो हो चुका है।

गठबंधन टूट गया और चुनावी विमर्श (Narrative) रातों-रात बदल गया। यही ‘डर्टी गेम’ का सबसे घातक पहलू है।

AI क्यों है सबसे खतरनाक ‘गेम चेंजर’?

आज के दौर में किसी नेता की छवि बिगाड़ने के लिए महीनों की मेहनत नहीं चाहिए। चंद सेकंड का एक फर्जी (Deepfake) ऑडियो या वीडियो किसी भी कद्दावर नेता के सालों के राजनीतिक करियर को पल भर में खाक कर सकता है।

इस ‘डर्टी गेम’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी ‘रफ्तार’ है। जब तक पुलिस या चुनाव आयोग उस वायरल वीडियो की सत्यता (Fact Check) साबित करता है,

तब तक करोड़ों मतदाता उसे सच मानकर व्हाट्सएप पर शेयर कर चुके होते हैं और वोट डालकर फैसला भी सुना चुके होते हैं।

सच जब तक अपने जूते पहनता है, तब तक ‘AI का झूठ’ आधी दुनिया का चक्कर लगा चुका होता है।

लोकतंत्र और चुनाव आयोग के लिए अभूतपूर्व चुनौती

यह नई तकनीक लोकतंत्र के लिए एक सीधा खतरा है। बंगाल मामले में मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि ‘शिकायत मिलने पर जांच होगी’, लेकिन चुनाव आयोग का यह पारंपरिक रवैया अब काम नहीं आएगा।

‘सुओमोटो’ (स्वतः संज्ञान) से आगे बढ़कर आयोग को एक ‘रियल-टाइम फैक्ट चेकिंग’ सिस्टम और सख्त साइबर कानूनों की तत्काल आवश्यकता है।

‘The Politics Again‘ का स्पष्ट मानना है कि यदि राजनीतिक दलों की इस ‘डिजिटल गुंडागर्दी’ और AI के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल पर तत्काल और सख्त लगाम नहीं लगाई गई, तो भविष्य के चुनाव जनता के असली मुद्दों (सड़क, शिक्षा, रोजगार) पर नहीं, बल्कि फर्जी वीडियो की बुनियाद पर लड़े जाएंगे।

आज हुमायूं कबीर शिकार हुए हैं, कल कोई और होगा। लोकतंत्र को बचाने के लिए अब चुनाव आयोग के साथ-साथ मतदाताओं को भी ‘डिजिटल साक्षर’ और सतर्क होना पड़ेगा। जो दिखता है या सुनाई देता है, जरूरी नहीं कि राजनीति में वही सच हो।

Santosh SETH

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