“उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति का केंद्र एक बार फिर ‘राम नगरी’ अयोध्या को बनाया है”
अयोध्या | 13 जनवरी, 2026 संतोष सेठ की रिपोर्ट
सोमवार को भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अयोध्या की पावन धरती से 2027 के लिए चुनावी बिगुल फूंक दिया। इस दौरान उन्होंने संकल्प लिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनकल्याणकारी कार्यों के दम पर भाजपा प्रदेश में फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी।
जिले की सीमा में प्रवेश करते ही पूर्व सांसद लल्लू सिंह के नेतृत्व में हजारों कार्यकर्ताओं ने पंकज चौधरी का जोरदार स्वागत किया। कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रदेश अध्यक्ष भावुक हो गए।
उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व का आभार जताते हुए कहा, “मुझ जैसे एक छोटे कार्यकर्ता को प्रदेश की कमान सौंपना केवल भाजपा में ही संभव है। विरोधियों ने कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन हमारे कार्यकर्ताओं का संकल्प अडिग है।”
अयोध्या का यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक गहरी संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा था। चौधरी ने अवध क्षेत्र के 14 जिलों की 86 विधानसभा सीटों की समीक्षा की।
दिग्गजों की मौजूदगी: बैठक में अवध क्षेत्र के 63 विधायकों और 7 मंत्रियों ने शिरकत की।
मिशन 2027 का खाका: पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रत्येक बूथ को मजबूत करने और सोशल इंजीनियरिंग के नए समीकरणों पर विस्तार से चर्चा की गई।
हनुमानगढ़ी में हाजिरी: चुनावी रणनीति साझा करने से पहले पंकज चौधरी ने हनुमानगढ़ी में दर्शन-पूजन किया और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का अयोध्या से अभियान शुरू करना एक सोची-समझी रणनीति है। राम मंदिर निर्माण के बाद भाजपा इस क्षेत्र को अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्ति के सबसे बड़े केंद्र के रूप में देख रही है। अवध की 86 सीटों पर पकड़ बनाए रखना लखनऊ की सत्ता तक पहुँचने का सबसे सुगम रास्ता माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में आने वाले 14 जिलों (अयोध्या, लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी, सुल्तानपुर, श्रावस्ती, बहराइच, बलरामपुर, गोंडा, प्रतापगढ़, अंबेडकरनगर, लखीमपुर खीरी और सीतापुर) की 86 सीटों का चुनावी इतिहास काफी दिलचस्प रहा है।
| पार्टी | 2017 परिणाम (सीटें) | 2022 परिणाम (सीटें) | बदलाव (+/-) |
| बीजेपी+ | 71 | 61 | -10 |
| सपा+ | 11 | 23 | +12 |
| बसपा | 02 | 00 | -02 |
| कांग्रेस | 02 | 02 | 00 |
2017 की लहर: 2017 में बीजेपी ने अवध की 80% से अधिक सीटें जीतकर विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था। राम मंदिर आंदोलन और ‘मोदी लहर’ के कारण गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटों का बड़ा ध्रुवीकरण हुआ था।
2022 की चुनौती: 2022 में भाजपा ने बहुमत तो बरकरार रखा, लेकिन सपा ने अंबेडकरनगर और बाराबंकी जैसे जिलों में भाजपा को कड़ी टक्कर दी और अपनी सीटों की संख्या दोगुनी से ज्यादा कर ली।
वर्तमान स्थिति (2026-27): पंकज चौधरी का अयोध्या से अभियान शुरू करना यह दर्शाता है कि भाजपा उन 10-15 सीटों को वापस जीतना चाहती है जो 2022 में उसके हाथ से निकल गई थीं।
अयोध्या फैक्टर: 2024 के लोकसभा परिणामों में अयोध्या (फैजाबाद सीट) के झटके के बाद, भाजपा अब विधानसभा चुनाव में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। पंकज चौधरी का “भावुक कार्ड” जमीनी कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने की कोशिश है।
जातीय समीकरण: अवध में कुर्मी (Pankaj Chaudhary खुद इसी समाज से आते हैं), पासी और ब्राह्मण वोट बैंक निर्णायक हैं। भाजपा इन 86 सीटों पर ‘हिंदुत्व + विकास + जातीय संतुलन’ का फार्मूला लागू कर रही है।
दिग्गजों की साख: अवध से ही योगी सरकार के कई कद्दावर मंत्री आते हैं। 63 विधायकों और 7 मंत्रियों की मौजूदगी यह बताती है कि पार्टी सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को कम करने के लिए कई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है।
अगर भाजपा अवध की इन 86 सीटों में से 65+ का आंकड़ा पार कर लेती है, तो लखनऊ में दोबारा सत्ता पाना उसके लिए बेहद आसान हो जाएगा। वहीं, सपा के लिए यह क्षेत्र अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को साबित करने की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है।
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