असम विधानसभा चुनाव 2026 BJP रणनीति

असम चुनाव 2026: BJP की हैट्रिक या सत्ता-विरोधी लहर? जानें NDA की ताकत और कमजोरियां | The Politics Again

‘असम चुनाव 2026: क्या ‘डबल इंजन’ के दम पर हैट्रिक लगाएगी BJP या ‘सत्ता-विरोधी लहर’ बिगाड़ेगी खेल? जानें पूरी इनसाइड स्टोरी ‘

गुवाहाटी/नई दिल्ली (The Politics Again): संतोष सेठ की रिपोर्ट 

निर्वाचन आयोग द्वारा असम की 126 विधानसभा सीटों पर 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही राज्य में सियासी बिसात बिछ चुकी है। 4 मई को आने वाले नतीजों से पहले सभी राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार अभियान तेज कर दिया है।

असम में इस वक्त मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाला भाजपा (NDA) गठबंधन सत्ता में है। 2016 में पहली बार 60 सीटें जीतकर सत्ता में आई भाजपा ने 2021 में 64 सीटें जीतकर अपना ग्राफ बढ़ाया था।

अब 2026 के इस महासमर में विपक्ष लगातार सत्ता-विरोधी लहर का दावा कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा की असल रणनीति, ताकत और कमजोरियां क्या हैं? आइए करते हैं गहराई से विश्लेषण:

BJP/NDA की ताकत (Strengths): ‘लाभार्थी’ वर्ग और शांति समझौते

  • विकास और शांति का दावा: भाजपा अपने शासन के रिकॉर्ड, संगठनात्मक ताकत और हाल के वर्षों में कई उग्रवादी/विद्रोही समूहों के साथ हुए ‘शांति समझौतों’ को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है।

  • कल्याणकारी योजनाएं (लाभार्थी वोटबैंक): समाज के विभिन्न वर्गों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं ने राज्य में एक बड़ा ‘लाभार्थी वोटबैंक’ तैयार किया है, जो पार्टी की बड़ी ताकत है।

  • ‘डबल-इंजन’ का नैरेटिव: मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की मुखर कार्यशैली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित शीर्ष नेतृत्व के लगातार दौरों ने राज्य में ‘डबल-इंजन सरकार’ की दलील को काफी मजबूती दी है।

कमजोरियां (Weaknesses): विधायकों का विरोध और भ्रष्टाचार के आरोप

  • स्थानीय सत्ता-विरोधी लहर: राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भले ही राज्य स्तर पर सरकार का प्रभाव हो, लेकिन कई सीटों पर स्थानीय विकास न होने के कारण मौजूदा विधायकों को जनता की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है।

  • अल्पसंख्यकों की नाराजगी: “अवैध घुसपैठ” और “मदरसों” को लेकर पार्टी की लगातार बयानबाजी के कारण अल्पसंख्यक मतदाताओं (खासकर बंगाली भाषी मुसलमानों) के एक बड़े तबके में पार्टी को कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

  • विपक्ष के आरोप: विपक्ष द्वारा मुख्यमंत्री हिमंता और उनके परिवार पर कई बार लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को भी चुनाव में भुनाने की कोशिश की जा रही है।

अवसर (Opportunities): बिखरा हुआ विपक्ष

  • भाजपा के लिए सबसे बड़ा ‘प्लस पॉइंट’ यह है कि उसके सामने विपक्ष कई धड़ों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक बिखरे हुए विपक्ष का सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिलता है।

  • इसके अलावा, राज्य सरकार की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और अन्य योजनाएं मतदाताओं के झुकाव को ऐन मौके पर NDA के पक्ष में मोड़ने की क्षमता रखती हैं।

चुनौतियां (Threats): टिकट बंटवारा और भीतरघात का डर

  • टिकट कटने पर बगावत: इस बार सत्ता-विरोधी लहर को कम करने के लिए पार्टी कई मौजूदा और दिग्गज विधायकों के टिकट काट सकती है। यदि इस असंतोष को ठीक से नहीं संभाला गया, तो ‘भीतरघात’ (Internal Rift) पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

  • ध्रुवीकरण के साइड-इफेक्ट: मुख्यमंत्री की बेहद आक्रामक राजनीतिक शैली और तीखे हमले कुछ सीटों पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर सकते हैं, जिससे कुछ इलाकों में चुनाव पूरी तरह से बिखर सकता है।

  • कार्यकर्ताओं की ढिलाई: लगातार दो बार से सत्ता में होने के कारण जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में ‘अति-आत्मविश्वास’ या ढिलाई देखी जा रही है, जो चुनाव के दिन मतदान प्रतिशत को प्रभावित कर सकती है।

निष्कर्ष: कुल मिलाकर, असम का चुनाव भाजपा के ‘संगठनात्मक तंत्र’ और विपक्ष के ‘सत्ता-विरोधी लहर’ के दावों के बीच एक सीधा और बेहद दिलचस्प मुकाबला होने वाला है।

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